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अफ्रीका के देशों में अनहोनी सी हो रही है। इससे पता पड़ता है कि एक नेता अपनी लोकप्रियता के घमंड में, निज सनक व मूर्खताओं से कैसे अच्छे-खासे देश को बरबाद कर डालता है।

✍हरिशंकर व्यास ✍

अफ्रीका के देशों में अनहोनी सी हो रही है। इससे पता पड़ता है कि एक नेता अपनी लोकप्रियता के घमंड में, निज सनक व मूर्खताओं से कैसे अच्छे-खासे देश को बरबाद कर डालता है। वह अपने को सिस्टम का पर्याय बनाता है और अंततः देश और खुद उसे बरबाद होना होता है। देश और राष्ट्र-राज्य का निर्माण लंबे सामूहिक संकल्प में हुआ करता है लेकिन देश की बरबादी के लिए एक नेता ही बहुत है। कुछ महीने पहले जिंब्बावें देश में मुगाबे का चक्रवर्ती राज खुद की और देश की बरबादी के साथ खत्म हुआ। आज खबर दक्षिण अफ्रीका के कथित चक्रवर्ती-लोकप्रिय-सख्त राष्ट्रपति जैकब जूमा के पतन की है। जैसे मुगाबे को उन्ही की पार्टी के लोगों ने कहा बहुत हुई बरबादी अब आप गद्दी छोड़िए वही मामला दक्षिण अफ्रीका में है। सत्तारूढ़ अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस ने राष्ट्रपति जैकब जूमा को कहा है कि वह 48 घंटे में पद छोड़ें। इस कॉलम के लिखने तक राष्ट्रपति ने ऐसा करने से इंकार किया है। उन्होने पार्टी से तीन महीने की मोहलत मांगी है। सो दक्षिण अफ्रीका में आगे गतिरोध और टकराव तय है।


दक्षिण अफ्रीका हकीकत में अफ्रीका महाद्वीप का नंबर एक देश है। गौरों द्वारा इस देश को बनाने में दस तरह की बातें और विवाद है लेकिन नेल्सन मंडेला को लौकतांत्रित तरीके से सत्ता सुपुर्द कर गौरो-अश्वेतों ने साझा सद्भाव ने दक्षिण अफ्रीका को आगे बढ़ाया, उसकी वैश्विक हैसियत बनवाई। मंडेला, मकेबी राष्ट्रपति जैकब जूमा पूरे अफ्रीकी महाद्वीप की बड़ी शख्शियत बने। नेल्सन मंडेला ने यदि दक्षिण अफ्रीका को आजादी दिलाई वे वहां के गांधी याकि राष्ट्रपिता बने तो मकेबी, जैकब जूमा मौटे तौर पर पंडित नेहरू वाली हैसियत इसलिए लिए हुए है क्योंकि उन्होने दक्षिण अफ्रीका को अपनी फितरत में ढ़ाला। वे लोकप्रियता के शिखर पर रहे और धमक-दबदबे में जो चाहा वह किया। 75 वर्षीय जूमा नौ सालों से