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पत्नी प्रधान, पर पति संभाले कमान”“निर्णय लेंगीं खुद आप, या रहेंगीं अंगूठा छाप”


   नील कमल शुक्ला

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पलामू :-- आधी आबादी को पूरा हक़ देने के लिहाज से सरकार द्वारा कई योजनाएं कार्यान्वित की जा रही हैं, जिसमें प्रमुख रूप से महिलाओं को भागीदार बनाया जा रहा है।अभी हाल में गुजरे निकाय चुनाव में भी सरकार द्वारा ज्यादा से ज्यादा पद महिलाओं के लिए आरक्षित किये गए और परिणाम भी सामने आया । कहीं कम तो कहीं ज्यादा मतों के अंतर से महिलाएं पद पर निर्वाचित हो कर सामने आयीं, लेकिन अब सवाल जो जेहन में कौंध रहा है कि “वो निर्णय लेंगीं खुद आप, या रहेंगीं अंगूठा छाप.

”शपथ लिया खुद, क्या फैसले का भी रहेगा सुध :

निकाय चुनाव में निर्वाचित प्रतिनिधियों को कल पद और गोपनीयता की शपथ दिलायी गयी, सादे समारोह में ही सही दर्जनों लोगों के बीच महिला प्रतिनिधियों द्वारा अपने पद के निमित मिले दायित्व के निर्वहन कर बाबत शपथ लिया गया, पर क्या उस शपथ को दिल में आत्मसात किये हुए खुद से निर्णय ले कर संकल्प को पूरा कर पाएंगीं यह एक यक्ष प्रश्न है।पत्नी प्रधान, पर पति संभालते हैं कमान :गद्दी पर बैठे कोई, पर राज्य चलावे कोई और। जी हां यह पंक्ति उन सभी महिला प्रतिनिधियों पर अब तक लागू होता आया है जिनके पिछले कार्यकाल को हमने-आपने नज़र किया है।कहने का तात्पर्य है कि पत्नी केवल नाम के लिए गद्दी पर बैठी रहती हैं जबकि राज्य उनके पति चालाया करते हैं, योजना चयन से ले कर क्षेत्र में उसके कार्यान्यवयन तक पदधारी पत्नी की नहीं बल्कि उनके पति की भूमिका अहम होती है। देखा जाता है कि कार्यालय हो या आवास कामवास्ते दो बात बोलने से ले कर दस बात लिखने में भी वो खुद से निर्णय नहीं ले सकतीं, जबान उनका होता है पर बोले जाने वाले हर शब्द उनके पति की होती है। कभी-कभी तो ऐसा देखने में आता है कि पति महाशय कार्यालय तक आ धमकते हैं और कार्यालिय आदेश भी खुद ही जारी किया करते हैं, ऐसे में यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए कि “पत्नी होती हैं प्रधान, पर पति संभालते हैं कमान.”सरकार दे रही हक़, साजन छीन रहे अधिकार :महिलाओं को सशक्त और स्वावलम्बी बनाने के उद्देश्य से सरकार और प्रशासन द्वारा महिलाओं को आधी आबादी कहते हुए पूरा हक़ दिया जा रहा है, पर इस पति प्रमुखता से ग्रसित मानसिकता वाले देश में उस अधिकारका पतियों द्वारा हनन किया जा रहा है। सीधे रूप में कहें तो पद पर पत्नी को नाम का बिठाते हैं वो और काम सारा खुद ही निबटाते हैं वो,देखा जाता है कि कुछ ऐसी भी पत्नियां होती हैं जो सरकार और प्रशासन द्वारा मिले हक को समझते हुए खुद से निर्णय ले कुछ कार्यों का संचालन करना चाहती हैं, मगर चाह कर भी नहीं कर पातीं क्योंकि पति के फरमान को नाफरमानीकरना उनके वश में नहीं होता । फलतः एक कसक के साथ दबी जुबान से वो कहती हैं कि “सरकार दे रही हक़, पर साजन छीन रहे अधिकार.”