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क्या नए संघर्ष की राह बढ़ चला है झारखंड ? ऐसी तस्वीरें नार्थ ईस्ट और कश्मीर से आती थी

क्या नए संघर्ष की राह बढ़ चला है झारखंड ? ऐसी तस्वीरें नार्थ ईस्ट और कश्मीर से आती थी.


ऐसी तस्वीरें नार्थ ईस्ट और कश्मीर से आती थी, अपने ही देश मे लोकतंत्र को स्वीकार न करने की इस परंपरा के मूल में क्या है ? ये कोई नहीं बता रहा, ये उस इलाके में निवास करने वाले लोगों की अज्ञानता है, या सच मे संविधान प्रदत शक्तियां उन्हें राह दिखा रही है, क्या आदिवासी इलाकों के समग्र विकास के लिए आज़ादी के बाद कुछ बेहतर हो पाया है ? और अगर विकास हो पाया है तो दुनिया के बहुमूल्य खनिजों को अपने  कोख में दबाए झारखंड के ग्रामीण इलाके सुलग क्यों रहे हैं ? क्यों लोग अपने ही जर जंगल ज़मीन के लिए लाठियां और गोलियां खाने को विवश हैं ? झारखंड के ग्रामीण इलाकों के विकास के लिए खर्च होने वाले लाखों करोड़ की राशि कौन हज़म कर रहा है ? झारखण्ड के मौजूदा हालात के लिए अगर चर्च जिमेवार है तो सात दशकों से सरकारें क्या कर रही थी ? राज्य सत्ता के खिलाफ़ अगर इतनी गहरी साजिश रची जा रही थी तोखुफिया एजेंसियां कहां सोई थी ? वैसे भी ग्रामीणों के द्वारा किया जा रहा हिंसक आंदोलन इसका निदान कभी नहीं हो सकता है, इतिहास गवाह है कि हिंसक आंदोलनों को कभी मंजिल नहीं मिली, 18वीं सदी में विश्व में तीन प्रमुख क्रांतियां हुई थी, ये भिन्न-भिन्न देशों में अवश्य हुई किन्तु इनके परिणाम एवं प्रभाव विश्व पर दूरगामी हुए,  इन क्रांतियों में सर्वप्रथम इंग्लैंड में घटित वैभवपूर्ण क्रांति (1688 ई.) है,  इसे 'गौरवशाली क्रांति' अथवा 'रक्तहीन क्रांति' भी कहा जाता है क्योंकि इस क्रांति में किसी भी पक्ष के व्यक्ति के रक्त की एक बूंद भी नहीं निकली और केवल प्रदर्शन एवं वार्तालाप से ही क्रांति सफल हो गई, इस मसले पर भी सरकार को व्यवहारिकता के साथ सहानुभूतिपूर्वक कदम उठाना चाहिए।
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