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प्रजातान्त्रिक व्यवस्था मे चुनाव एवं चुनाव आयोग की भूमिका और राजनैतिक दलों की बेलगाम होती जुबान पर अंकुश पर विशेष-



सुप्रभात-सम्पादकीय

साथियों,  प्रजातांत्रिक व्यवस्था में लोकतंत्र को मजबूती देने के लिए चुनाव की विशेष अहम भूमिका होती है क्योंकि चुनाव के जरिए ही लोकतंत्र को मजबूती प्रदान होती है और वह फलता फूलता परवान चढ़ता है। इस प्रजातांत्रिक व्यवस्था को मूर्ति रूप देने के लिए हर 5 वर्ष पर चुनाव कराए जाने की व्यवस्था ग्राम स्तर से लोकसभा स्तर तक होती है। इस लोकतांत्रिक महापर्व को निष्पक्ष शांति एवं सौहार्द पूर्ण पारदर्शिता के साथ संपन्न  कराकर जनप्रतिनिधियों के चयन करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी चुनाव आयोग पर होती है। चुनाव आयोग एक ऐसी संवैधानिक व्यवस्था है जो देश में सर्वोच्च मानी जाती है और सिर्फ राष्ट्रपति के अधीन रहकर चुनाव संपन्न कराने का कार्य करती है। यही कारण है कि जब चुनाव का समय आता है तो समस्त कार्यपालिका उसके अधीन होकर उसके इशारे पर कार्य करने को मजबूर हो जाती है। आजादी के बाद से अब तक तमाम सारे चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति हमारे यहां पर हो चुकी है किंतु पूर्व चुनाव आयुक्त  टीएन शेषन का कार्यकाल चुनाव आयोग के इतिहास में हमेशा याद किया जाने वाला है। शेषन ने पहली बार अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए राजनैतिक दलों को यह बता दिया था कि भारत जैसे प्रजातांत्रिक देश में चुनाव आयोग का क्या महत्व होता है और उसे कैसी भूमिका चुनाव के दौरान निभानी चाहिए। चुनाव आयोग चुनावी पारदर्शिता एवं सुधार लाने के लिए समय-समय पर राजनीतिक दलों एवं उसके समर्थकों की शंकाओं का समाधान करते हुए चुनाव प्रणाली में तरह-तरह के बदलाव एवं दिशा निर्देश जारी करता रहता है ताकि चुनाव के दौरान सामाजिक समरसता के साथ साथ धर्मनिरपेक्षता एवं विश्वास बना रहे।इसके लिए एक आदर्श चुनता आचार संहिता होती है जिसका अनुपालन चुनाव में हिस्सा लेने वाले सभी दलों एवं उसके राजनेताओं को करना पड़ता है और जो इसका उल्लघंन करता है उसके खिलाफ मुकदमे भी दर्ज कराए जाते हैं।इन मुकदमो की सुनवाई हमारी न्यायपालिका करती है और कभी कभी चुनाव भी रद्द कर दिये जाते हैं। चुनाव के दौरान मतदाताओं को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए राजनेताओं द्वारा तरह-तरह के हथकंडे एवं जुबानी जंग शुरू कर दी जाती है जिसे नियंत्रित करने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की होती है।इस समय हो रहे लोकसभा चुनाव को लेकर राजनेताओं में जुबानी जंग एवं मतदाताओं को बरगलाने लुभाने का दौर चल रहा है।अधिकांश राजनीतिक दलों के लोग मतदाताओं को लुभाने और अपने राजनीतिक माया जाल में फसाने के लिए अपने अपने अंदाज में लोकतांत्रिक मान मर्यादाओं को तार तार कर भाषण बाजी कर रहे हैं जिससे सामाजिक समरसता एवं आपसी सौहार्द को प्रभावित हो रहा है।राजनेता अपनी चुनावी हविश को पूरा करने के लिये हमारी  संस्कृति को ही नहीं बल्कि देश की सर्वोच्च अदालत तक को लपेटे में लेने से नही चूक रहे हैं। शायद यही कारण था कि ऐसे राजनेताओं की बेलगाम जुबान पर रोक लगाने के लिए देश की सर्वोच्च अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा है। सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद चुनाव आयोग ने भी अपने पास अधिकार न होने का रोना रोना छोड़ कर सजग होकर अपने कर्तव्य पथ पर सक्रिय हो गया है। चुनाव आयोग द्वारा चुनाव के दौरान हो रही आपत्तिजनक जुमलेबाजी पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए पहली बार अपने अधिकारों का प्रदर्शन  कर बदजुबान राजनेताओं की जुबान पर ताला लगाने की पहल की गई है। चुनाव आयोग पिछले तीन दिनों के अंदर अबतक  के तमाम नेताओं के चुनाव प्रचार करने पर रोक लगा चुकी है और लगातार यह क्रम जारी है। इस कड़े रूख के बाद राजनीतिक दलों में खलबली सी मच गई है और उन्हें पहली बार अपनी औकात का अहसास होने लगा है इसके बावजूद उनकी जुमलेबाजी कम नही हो रही है। चुनाव आयोग के इस कढ़े तेवर  के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए एक दल विशेष की राजनेता को निराशा मिलने के बाद लोगों का विश्वास एक बार फिर चुनाव आयोग एवं न्यायपालिका के  प्रति  बढ़ा एवं मजबूत हुआ है है जो लोकतंत्र के उज्जवल भविष्य के लिए शुभ माना जा रहा है। इसके लिए चुनाव आयोग बधाई का पात्र है। धन्यवाद्।। भूल चूक गलती माफ।। सुप्रभात/ वंदेमातरम्/ गुडमॉर्निंग/ नमस्कार/ आदाब/ शुभकामनाएं।।ऊँ भूर्भुवः स्वः------/ऊँ  नमः शिवाय।।।

भोलानाथ मिश्र

वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी

रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी