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इस्लाम में पाँच रातों की बड़ी फ़ज़ीलत बयान की हैं। जिसमे से एक रात शबे बरात भी हैं।

शेख नसीम की कलम से)

भोपाल@ आज शबे बरात की रात हैं। इस्लाम में पाँच रातों की बड़ी फ़ज़ीलत बयान की हैं। जिसमे से एक रात शबे बरात भी हैं।

शबे बरात क्या हैं। शबे बरात कोई त्यौहार नहीं हैं ये सिर्फ इबादत की रात हैं। क्योंकि अल्लाह के रसूल का इर्शाद हैं। की इस्लाम में सिर्फ दो त्यौहार हैं एक ईद उल फ़ित्र जो रमजान के पाक महीने के बाद ईद की शक्ल में मनाते हैं। जिसे मीठी ईद भी कहते हैं और दूसरा ईद उल ज़ुहा के नाम से मशहूर हैं जो हज़रत इब्राहिम अलै, की याद में हज के महीने 10वीं तारीख को जानवरों की कुर्बानी करके मनाया जाता हैं। इन दो त्योहारों के अलावा इस्लाम में किसी त्यौहार का ज़िक्र नहीं हैं। लेकिन बाज़ मुसलमान इन दो त्योहारों के अलावा भी इस्लाम की दूसरी तारीखों को भी त्यौहार समझकर मनाते हैं। जिनमे शबे बरात,ईद मीलादुन्नबी,मोहर्रम और रजब के महीने में कुंडे की शक्ल में मनाते हैं। ये सरासर गुमराही हैं। सिर्फ दो त्योहारों के अलावा इस्लाम में कोई तीसरा त्यौहार नहीं हैं।

शबे बरात की फ़ज़ीलत के एतबार से रिवायत में आया हैं की हज़रत आइशा रज़ि, फरमाती हैं की एक रात अल्लाह के रसूल को अपने हुजरे में न पाया तो मै बाहर आकर देखने लगी तो मुझे अल्लाह के रसूल जन्नातुल वकीअ कब्रस्तान से आते हुए नज़र आए जब आप अपने घर में तशरीफ़ लाए तो मैने पूंछा ऐ अल्लाह के नबी आप कहाँ गए थे तो आपने फरमाया ऐ आइशा आज शबे बरात की रात हैं और में जन्नातुल वकीअ से आ रहा हूँ। आज की रात अल्लाह पहले आसमान पर आ जाते हैं और इर्शाद फरमाते हैं हे कोई रोज़ी चाहने वाला की मै उसको रोज़ी अता करू। हे कोई मग़फ़िरत मांगने वाला की मै उसकी मग़फ़िरत करूँ। हे कोई गुनाहो से तौबा करने वाला की मै उसकी तौबा क़ुबूल करूँ। ग़रज ये हैं की मुख़्तलिफ़ इर्शाद अल्लाह की तरफ से होते हैं। फिर आपने फरमाया ऐ आइशा इस रात में कसरत से नमाज़ों का ज़िक्र का तिलावत का एहतिमाम करना चाहिए और अपने गुनाहो की अल्लाह से माफ़ी मांगना चाहिए।

सिर्फ ये फ़ज़ीलत हैं इस रात की इसके अलावा कोई चीज़ इस रात में करने की नहीं हैं।

लेकिन उम्मत में इल्म की कमी की वजह से बहुत सी खुराफातें इस रात में लोग करते हैं। जिसका न कुरआन में कोई ज़िक्र हैं और न ही हदीस में कोई सनद या हवाला हैं। मसलन इस रात में जाहिल लोग अपने घरों में रौशनी करते हैं और हलवा बनाकर फ़ातिहा पड़ते हैं और कहते हैं हमारे पुरखो की रूहें घरो में आती हैं। ये सब बिदअत हैं और सारी बिदअत जहन्नम में जाएगी। दीन सिर्फ वो हैं जो अल्लाह ने अपने रसूल के ज़रीए इस उम्मत को दिया। इस रात में कुछ और खुराफातें होती हैं जेसे बच्चे रात भर साईकल चलाते हैं और रेकेट खेलते हैं और नोजवान लड़के बाइक से रात भर स्टंट करते हैं जिसकी वजह से सुबह खबर मिलती है की फला का बेटा फला का भाई फला का दोस्त अब इस दुनिया में नहीं रहा। क्या हुआ की रात में एक्सीडेंट हो गया था।

इसलिए हमारी ज़िम्मेदारी बनती हैं की हम अपने आसपास जो रातो में इन खुराफतों में मशगूल हैं उनको रोके और समझाए और इस रात में क्या करना हैं और क्या नहीं करना ये बताएं तब कही जाकर हमारी ज़िम्मेदारी खत्म होगी। अगर हम ये कहे की वो जाने और उनका काम तो याद रखो अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त हैं।

इसीलिए इस रात में सिर्फ इबादत करना चाहिए। अल्लाह के रसूल सिर्फ एक बार शबे बरात में कब्रस्तान गए हैं। तो खामोशी के साथ चुपचाप अल्लाह का ज़िक्र करते हुए कब्रस्तान में जाकर अपने आबा और अज़दाद के लिए दुआएं मग़फ़िरत करनी चाहिए। ये ज़रूरी नहीं की फ़ातिहा कब्रस्तान जाकर ही पढ़नी चाहिए आप घर में बाज़ार में मस्ज़िद में दुकानों से कही से भी फ़ातिहा पढ़ सकते हैं। और उसका सवाब तमाम लोगो की क़ब्रो में पहुँच जाएगा। जैसे बन्दा जब दरूद शरीफ पढ़ता हैं चाहे वो दुनिया के किसी कोने में भी हो फ़रिश्ते उस दरूद शरीफ को अल्लाह के नबी के पास पहुंचा देते हैं। उसी तरीके से फ़ातिहा भी कही से भी पढ़ लो उसका सवाब अल्लाह अपने बन्दे की कब्र में पहुंचा देते हैं। एक बात और इस रात में अल्लाह पाक अगली शाबान की 15वीं रात तक की एक साल की पूरी लिस्ट मलकुल मौत को थमा देते हैं। और उस लिस्ट में साल भर तक के बन्दों के आमाल होते हैं। इस साल कितने बच्चे पैदा होंगे। कितने लोग मरेंगे,कितनो के निक़ाह होंगे कितने लोग हज करने जाएंगे कितने लोग मालामाल होंगे और कितने लोग कंगाल होंगे ये सब फरिश्तों को लिखकर दे दिया जाता हैं।


लेकिन इस मुबारक रात में कुछ बदनसीब लोग ऐसे भी होते हैं जिनकी इस रात में भी बख्शिश नहीं होती हैं। और ये चार किस्म के लोग होते हैं।

1) अल्लाह के साथ शिर्क करने वाला, 2) शराब पीने वाला, 3) माँ,बाप का नाफरमान और 4) हसद और कीना रखने वाला ये चार किस्म के लोगो की अल्लाह इस रात में तो क्या किसी भी रात में मग़फ़िरत नहीं करते हैं। जब तक उन गुनाहों से तौबा न करले। अल्लाह हम सबको इस रात की कदर करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए और सही इल्म के साथ इबादत करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए।

आमीन।।।।।।।।।।