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15 दिन और हार गई तीन ज़िन्दगी

Journalist Arvind Pratap.        पहली घटना- हरमू नदी के पास स्थित रियालयन्स ट्रेंड्स की सात मंजिला निर्माणाधीन मॉल, समय 1 बजे(दोपहर) रातू रोड की रहने वाली अदिति रिजल्ट खराब होने के बाद परिजनों की पड़ी डांट के बाद मॉल के सात मंजिले टॉप पर पंहुचती है और कूद जाती है और एक झटके में हो जाती है एक युवती की दर्दनाक मौत।

दूसरीघटना- केतारी बगान रेलवे फाटक के समीप एक नाबालिग लड़की नें ट्रेन से कटकर अपनी जान दे दी मौके पर ही उसकी भी दर्दनाक मौत हो गयी, स्थानीय लोगों के अनुसार मृतका परीक्षा में कम नम्बर आने से परेशान थी अंततः उसने यह कठोर कदम उठाया।

तीसरीघटना- मैट्रिक परीक्षा में फेल हो जाने पर तमाड़ स्थित प्लस टू हाई स्कूल के छात्र ने फांसी लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। मृतक का नाम विमल अधिकारी उर्फ़ बिक्की था, परिजनों के अनुसार मैट्रिक परीक्षा में फेल होने के कारण उसने ऐसा किया, घटना के बाद व्याकुल परिजनों ने विमल को तमाड़ पीएचसी में भर्ती कराया, जहां डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया ।

इन घटनाओं के बारे जरा तफसील से सोचिएगा, ऐसा नहीं है कि इस तरह की घटनाएं इलाके में पहली बार हुई हैं, गत वर्षों में इस तरह की घटी घटनाओं के कारण तो रांची और जमशेदपुर की पहचान #सुसाईडसिटी के रूप में होने लगी थी।।      इन घटनाओं के नेपथ्य में मुख्य रूप से परीक्षा में असफल होने के बाद अपनों की बेरुखी का कारण ही सामने आते रहा है, हालांकि अब इसके कई फैक्टर हैं। एक्सपर्ट बताते हैं 

दरअसल परीक्षा के बाद 'मेन स्ट्रीम मीडिया' और सोसाइटी के द्वारा जिस तरह रिजल्ट को ग्लैमराइज कर दिया जाता है, उसके कारण भी एग्जाम में असफल छात्र तनाव में आ जाते हैं, उन्हें लगता है की रिजल्ट ख़राब हो जाने से उन्होनें कोई बड़ा अपराध कर दिया हो और बाकी कसर छात्र के परिजन पूरी कर देते हैं उन्हें डांट-फटकार कर उन्हें अपराध-बोध का अहसास करवा कर। आज बच्चों में आत्महत्या के ऐसे कृत्रिम हालात जान बूझ कर पैदा किये जा रहे हैं जो दशकों पूर्व नहीं थे। अगर सहजता से इन हालातों पर नहीं सोचा गया तो एग्जाम के कारण एक ओर बस्तियों में जहां मिठाईयां बटेंगी, वहीं दूसरे टोले मातम में डूबे रहेंगे।

       रोकने के कुछ आंशिक उपाय:


1. हर स्कूल में इसकी काउंसलिंग की व्यवस्था हो। एन्टी रैगिंग यूनिट की तरह एक यूनिट की स्थापना हो।

2. एग्जाम से पूर्व बच्चों के मानसिक मज़बूती के लिए स्कूलों में कार्यशाला का आयोजन।

3. आत्महत्या की घटना के बाद जांचोपरांत परिजनों पर हत्या के उकसावे का मामला दर्ज हो।

4. रिजल्ट के समय सूबे के इंटेलिजेंस सर्विस को भी इस मसले पर चौकना रहना चाहिए। दुनिया के कई ऐसे देश हैं जहां इस तरह की व्यवस्थाएं की जाती है।

5. मीडिया के द्वारा इन मौकों पर एक्सपर्ट आधारित तथ्यपरक लेखों का प्रकाशन

  अगर हालात यही रहा तो इस तरह की घटनाओं को रोकना बेहद मुश्किल हो जाएगा। मैं तो उन पैरेंट्स के बारे में  सोचकर द्रवित हो जाता हूं, जिनकी बच्चों के एक खरोंच के बाद जान निकल जाती होगी, जिसे कितने जतन के से पाला-पोसा था आज वही बच्चे बेजान जिस्म बन उनके बाहों में पड़े होते हैं, अपने जिगर के टुकड़ों के ऐसे नृशंश मौतों के बाद उन पर क्या गुजरती होगी, इसे बस अहसास किया जा सकता है। अब तो उनके अपराध की सजा जीवन भर उन्हें बच्चों के खो देने की पीड़ा के दावानल में जल कर उन्हें चुकानी पड़ेगी। दरअसल आज इन बच्चों की मौत के जिमेवार केवल उनके परिजन नहीं हैं बल्कि हमारे समाज की बाज़रवादी व्यवस्था भी इसका बड़ा कारण है, जिसने समाज के साथ-साथ परीक्षा और छात्रों के बीच एक गहरी खाई खोद दी है। 

एक बात और रिजल्ट खराब होने का बाद परिजनों के फटकार से आहत 15 दिनों में 3 नौनिहालों के इस दर्दनाक मौतों के बाद मैं तो इसे 'कोल्ड ब्लडेड मर्डर, ही कहूंगा। दुःखद है कि इतना होने के बाद भी सूबे के शासन व्यवस्था को कोई फर्क ही नहीं पड़ता। शिक्षा व्यवस्था के नाम पर करोड़ों ख़र्च करने वाली सरकार और उसके नुमाइंदों के पास फुर्सत ही नहीं है कि वे इस दिशा में कोई ठोस पहल करें ताकि इस तरह की घटनाओं को रोकी जा सके।