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उन्हें शर्म तक नहीं आती हम उनके लिए लड़े-कटे मरे जाते हैं अजीब यह सियासत है

नेताओं का वैचारिक स्थानांतरण..!

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          उन्हें शर्म तक नहीं आती

          हम उनके लिए

          लड़े-कटे मरे जाते हैं 

          अजीब यह सियासत है  

          जनता आम ही रही

          नेता और खास होते गए।।   

  दल-बदल और निर्दल के खेल में सब कुछ ऐसे मिक्स होता जा रहा है, जहां राजनीतिक नैतिकता और वैचारिक प्रतिबद्धता की बातें जैसे बिल्कुल खोखली लगने लगी है। चुनावी घोषणा से पूर्व से चल रहा दल बदल व वैचारिक प्रतिस्थापन का यह खेल अब भी जारी है। झारखंड में प्रथम चरण के चुनाव के क्रम में जिन 13 सीटों पर चुनाव कराए जा रहे हैं, उनमें पलामू प्रमंडल के भी 9 सीट शामिल हैं। पलामू में दल बदल के साथ निर्दल का खेल भी खूब चला है। निश्चित रूप से इस मामले में भी भाजपा अव्वल रही है। जैसे चुनाव से पूर्व कई दलों के नेता भाजपा में शामिल हुए, कुछ उसी अंदाज में पार्टी के लोग टिकट नहीं मिलने पर दूसरे दलों से अथवा निर्दल होकर चुनाव मैदान में उतर आये हैं। वैसे यह कोई एकल भाजपा की समस्या नहीं है। बल्कि इस समस्या ने देश स्तर पर राज नीति को व्यापार नीति में तब्दील कर दिया है। 

      राज नीति के इस व्यापार नीति बनने के पीछे केवल और केवल जनता के पैरोकार कथित वेनेता हैं, जो अपने लिए एक ऐसा आसरा और आशियाना ढूंढते हैं, जहां वे बेफिक्री के भाव से विलासिता पूर्ण जीवन बसर कर सकें। यही कारण है कि पार्टी में रहते हुए खुद को पार्टी के लिए अद्वितीय बताने वाले ऐसे लोग क्षणभर में दूसरे दल की ओर से उतनी ही निष्ठा और प्रतिबद्धता के साथ प्रवचन करने लगते हैं।

  •       पलामू में भाजपा के जिन नेताओं ने अपने वैचारिक स्थानांतरण के साथ दल-बदल व निर्दल के रूप में आज खुद का और दूसरे लोगों का  गुणगान करने में लगे है, उन्हें शायद इस बात का ईल्म ही नहीं की यह जनता भले ही गरीब और अशिक्षित रही हो, लेकिन जनता सबों को एक ही पंक्ति में पाते हुए भी अपने फर्ज और कर्तव्य को पूरा करने के लिए किसी एक को अपने मत का दान करती है। 

   पलामू में सबसे बड़ा जो नाम दल-बदल करने वालों में रहा है, वह नाम भाजपा के मुख्य सचेतक राधा कृष्ण किशोर का है। वैसे राधा कृष्ण किशोर सही मायने में  दल-बदल के सच्चे हमराह रहे हैं। कॉन्ग्रेस के रहते हुए जदयू से होकर फिर वे भाजपा के बने थे। भाजपा के होने के बाद तो ऐसा प्रतीत होता था शायद वे अब आजीवन कहीं और न जाएंगे। परिवार का पूरा कुनबा ही जैसे भाजपामय लगने लगा था। पर ना जाने क्या हुआ कि रघुवर और शाह की जोड़ी ने उनकी चातुर्य और वाकपटुता को नजरअंदाज कर उन्हीं की तरह फिर से एक नए बोरो प्लेयर को उनकी जगह छतरपुर से मौका दे दिया। ऐसे में भला किशोर के लिए बैठ जाना कहां तक संभव था? हुआ भी वही, किशोर अब तक की सहयोगी रही मगर इन दिनों किशोर की ही तरह नाराज आजसू पार्टी  के पास चले गए। यह आजसू के लिए भी बैठे-बैठाए ही पार्टी विस्तार का मौका था, सो लगे हाथ उन्होंने किशोर को अपना प्रत्याशी भी घोषित कर दिया। सवाल यह है कि भाजपा के मुख्य सचेतक रहे राधाकृष्ण किशोर अब किन मुद्दों और किस बात को लेकर चुनाव में जाएंगे? 

       भाजपा के दूसरे बागी जिला परिषद उपाध्यक्ष संजय कुमार सिंह हैं। उन्हें ऐसा लगता था कि पार्टी इस बार डाल्टनगंज विधानसभा क्षेत्र से उन्हें ही टिकट देगी। वैसे कई और लोग थे, जिन्हें भी ऐसा ही लगता रहा था। लेकिन वे लोग तो चुप रह गए मगर संजय सिंह खुद को रोक न पाए, उन्हें निर्दल भी जीत जाने का पूरा भरोसा रहा है। 

  •     हुसैनाबाद से भाजपा का टिकट नहीं मिलने पर विनोद कुमार सिंह तथा प्रफुल्ल कुमार सिंह भी निर्दल उम्मीदवार के रूप में उतर चुके हैं। हालांकि बाद में आजसु के साथ तालमेल ना बैठने की स्थिति में भाजपा ने विनोद सिंह को समर्थन करने का निर्णय लिया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या नेताओं के लिए चुनाव ही सबसे महत्वपूर्ण है? यदि ऐसा है तो बागियों की यह फेहरिस्त कभी छोटी ना होगी। 

    सबसे फिक्र करने की बात यह है कि चुनाव लड़ने का ऐसा अतिवाद राजनीतिक दलों और मतदाताओं के लिए चिंता का विषय बन गया है। जहां कार्यकर्ता पार्टी के लिए कुछ करने के बजाए नेता बनने और चुनाव लड़ने के लिए ही किसी राजनीतिक दल से जुड़ता दिखाई देता है। ऐसे लोगों के लिए ना तो पार्टी की नीति, सिद्धांत और विचार कोई मायने रखता है और ना ही इनके लिए नैतिकता, सुचिता और राजनीतिक मूल्य ही कोई मायने रखते हैं। ऐसे में आम आदमी के समक्ष यह एक विकट स्थिति उत्पन्न होती जा रही है कि आखिर वह ऐसे विचारहीन और चरित्रहीन नेताओं को वोट दे, या उनका बहिष्कार करें?

                                 श्याम किशोर पाठक

                   Pathak.shayam@gmail. com

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