सैनिक पेट पालने के लिए कभी कतरब दिखाता, कभी झंडे बेचता है

गणतंत्र दिवस करीब आने के साथ ही सारा देश उत्सवधर्मी हो गया है, वहीं बचपन का एक ये चेहरा भी है. ये परेड के लिए कलफ लगे कपड़े नहीं खोजता. सुबह जागने के लिए इन्हें कोई अलार्म घड़ी नहीं जुटती. ये गुलाब, गेंदे या चांदनी के फूल इसलिए नहीं जमा करते हैं कि झंडा खुलने पर झरते फूल उन्हीं का नाम पुकारें.

झंडा इनके भीतर भी भाव लाता है लेकिन हमारी तरह एक-दिवसीय देशभक्ति का नहीं, पेट भरने की उम्मीद का.

देशभक्ति के गाने सुनकर नॉस्टैल्जिक होनी की लग्ज़री इन्हें नहीं जुटती. सड़कों पर सैनिकों की पोशाक पहनकर जयहिंद के नारे लगाते तो कभी फूल और झंडे बेचते ये चेहरे अपना बचपन खुद कहते हैं. पढ़ें, विजय की कहानी.



मुझे याद नहीं कि मेरा गांव कहां है. मैं बहुत बचपन से अपने चाचा के साथ सड़क पर रह रहा हूं. दिनभर सिग्नल पर कभी फूल, तो कभी कार की खिड़कियां साफ करने के कपड़े बेचता हूं. चाचा कहते हैं कि बच्चों को देखकर लोगों का दिल जल्दी पसीज जाता है. और ऐसा होता भी है. चाचा की उतनी कमाई नहीं होती, जितनी मेरी. वो अब सड़क किनारे सायकिल पंचर की दुकान करते हैं. मैं पास की बत्ती पर खड़ा सामान बेचता हूं. हर कुछ महीनों में चाचा कोई नई चीज बेचने के लिए ला देते हैं, जैसे कभी खिलौने तो कभी टॉर्च.

दो साल पहले चाचा को उनकी जान-पहचान वाले ने सैनिकों जैसे लगने वाली ड्रेस दी. चाचा ने कहा कि जैसे दुकान में काम करने वालों की, स्कूल जाने वाले बच्चों की यूनिफॉर्म होती है, वैसे ही ये मेरी यूनिफॉर्म है.

वे कहते हैं कि 15 अगस्त और 26 जनवरी पर मैं यही पहनकर सिग्नल पर जाऊं. मैं यही करता हूं. लाल बत्ती पर गाड़ियां रुकती हैं तो मैं हर गाड़ी की खिड़की खटखटाकर जयहिंद बोलते हुए करतब दिखाता हूं. दो दिनों पहले झंडे भी बेचता हूं.




गाड़ी का शीशा थपथपाने से पहले देखता हूं कि अंदर कौन हैं. बच्चों के साथ जा रहे लोग हमेशा झंडा ले लेते हैं. जोड़े में जा रहे लोग भी खरीदते हैं और दाम से दोगुनी कीमत भी दे देते हैं लेकिन मेरे पास छुट्टे पैसे हों तो मैं हमेशा वापस कर देता हूं. पिछले साल से हम दो दोस्त मिलकर सिग्नल पर ये काम कर रहे हैं. मैं करतब दिखाता या झंडे बेचता हूं और वो फूल बेचता है. जो भी कमाई हो, हम आधी-आधी बांट लेते हैं. मैं अपने पैसे चाचा को ले जाकर दे देता हूं.

मैं कभी स्कूल नहीं गया. टीवी पर देखता हूं कि कैसे बच्चे सबेरे से परेड ग्राउंड में जमा होते हैं. उनके कपड़े कितने साफ होते हैं और चेहरे कितने खिले हुए. उन्हें पूरा देश टीवी पर देख रहा होता है लेकिन मैं यहां खाने के लिए झंडे या गुलाब बेच रहा होता हूं.