भाजपा का परचम। राजस्थान सहित अन्य राज्यों के चुनाव पर पड़ेगा असर।



3 मार्च को पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय के चुनाव परिणाम भी सामने आ गए है। इन तीनों ही राज्यों में विधानसभा की साठ-साठ सीटें हैं। त्रिपुरा में भाजपा को 40, लेफ्ट 20 सीटें मिली हैं, जबकि कांग्रेस का तो निशान ही मिट गया है। इसी प्रकार नागालैंड में भाजपा को 27, एनसीएफ को 29 तथा कांग्रेस को मात्र 2 सीटें मिली है, इसी प्रकार मेघालय में भले ही भाजपा को 4 सीटें मिली हों, लेकिन कांग्रेस फिर से सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है क्योंकि कांग्रेस को 20 सीटें ही मिली है, जबकि एनपीपी को 19 तथा निर्दलीय को 13 सीटें हासिल हुई है। जाहिर है कि भाजपा के सहयोग से एनपीपी की सरकार बनेगी। यानि पूर्वोत्तर के इन तीनों राज्यों में भाजपा का परचम फहरेगा। त्रिपुरा में पिछले 25 वर्षों का जिस तरह लेफ्ट का शासन खत्म हुआ है उससे प्रतीत होता है कि पूर्वोत्तर राज्यों की जनता ने कांग्रेस और लेफ्ट के मुकाबले में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की नीतियों को पसंद किया है। पिछले कई वर्षों से संघ के कार्यकर्ता पूर्वोत्तर में सक्रिय थे। संघ के कार्यकर्ताओं को सफलता दिलवाने में पीएम नरेन्द्र मोदी का चेहरा काम में आया है। पीएम ने पूरे चुनाव में विकास का जो मुद्दा रखा, वह कामयाब रहा है। बंगाल के छिनने के बाद लेफ्ट लगातार सिमटता जा रहा है, लेकिन कांग्रेस का भी बुरा हाल है।

अन्य राज्यों के चुनावों में पड़ेगा असरः

त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय में जिस तरह कांग्रेस का सूपड़ा साफ हुआ है, उसका असर इस वर्ष होने वाले कई राज्यों के चुनावों पर पड़ेगा। इस वर्ष कर्नाटक, राजस्थान, एमपी, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में चुनाव होने हैं। हालांकि उपचुनावों में जीत से कांग्रेस भले ही जश्न में हो लेकिन पूर्वोत्तर के परिणामों ने कांग्रेस को सोचने पर मजबूर कर दिया है। पूर्वोत्तर के चुनावों में मोदी की तरह राहुल गांधी ने भी जनसभाएं की थी, लेकिन परिणाम बताते हैं कि लोगों ने भाजपा और मोदी पर भरोसा किया है। अब देखना होगा कि इन हालातों से कांग्रेस कैसे निपटती है। भाजपा के लिए यह खुश खबरी है कि जहां पहले ही 20 राज्यों में सरकारें हैं वहीं तीन राज्यों में सरकार बनाने जा रही है। देश के 80 प्रतिशत भू भाग पर अब भाजपा का शासन हो गया है। पंजाब, कर्नाटक और एक दो राज्यों को छोड़ कर कांग्रेस का अब कहीं भी शासन नहीं रहा है। जबकि पूर्वोत्तर में जहां भाजपा का नामोनिशान नहीं था, वहां भी परचम फैल गया है। भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व तो 2019 के लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज कराने में लगा हुआ है। माना जा रहा है कि उत्तर भारत से सीटे कम होती है तो उसकी भरपाई पूर्वोत्तर से की जाएगी। 

एस.पी.मित्तल) (03-03-18)