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मुज़फ्फ़रपुर के भूखे बच्चों की आवाज़ स्वर्ग से---एक सूखी रोटी थी मेरी क्या तुम ने कहीं पर देखी है ?

एक सूखी रोटी थी मेरी ।

क्या तुम ने कहीं पर देखी है ?

मैं घूम चुका बस्ती बस्ती ।

मैं ढूंढ चुका खरिया खरिया ।

मैं सोच रहा था पेट भरूँ ।

कुछ भूख को अपनी मार सकूँ।

माँ भूखी , बाबा भूखा है ।

घर पर इफ्लास  का साया है ।

मैंने सोचा कुछ काम करूँ ।

पढ़ लिख के जग में नाम करूँ ।

मेरा भी भला सा एक घर हो ।

खुशियों का आना जाना हो ।

जिस घर में बहुत सा खाना हो ।

कोई भूखे पेट ना सोये जहाँ ।

मैं सोच रहा था जाऊँ  कहाँ ?

ये पेट की आग बुझाऊँ कहाँ ?

रस्ते में नज़र एक बाग़ आया ।

ठंडा ठंडा , साया साया ।

सब पेड़ खड़े थे झुके -झुके ।

फल पेड़ों पर थे लदे-लदे ।

कुछ लाल-लाल ,कुछ हरे-हरे ।

लीची के फल खट्ठे-मीठे ।

सब अमृत रस से भरे हुए ।

मुझे भूख लगी थी ज़ोरों की ।

कुछ पेट भरा कुछ जेब भरी ।

फिर  माँ बाबा याद आया था ।

कुछ फल मैं घर भी लाया था ।

कब सुबह हुई कुछ याद नहीं ।

बस ज़ोर से चक्कर आया था ।

मेरा बाबा लाद के कंधे पर ।

मुझे हॉस्पिटल ले आया था ।

कुछ और भी मेरे जैसे थे ।

जो अंतिम सांसें गिनते थे ।

मैं देख के उनको घबराया ।

फिर शोर शराबा ख़ूब हुआ ।

नेता जी मिलने आए थे ।

कच्चे वादे फ़रमाए थे ।

कुछ पल बीते कुछ रात गए ।

यमराज भी मिलने आए थे ।

कुछ रोटी साथ में लाए थे ।

अब भूख तो मेरी मिट ही गई ।

दो रोटी मुझ को मिल ही गई ।

यमराज से मैंने तब पूछा ।

एक सूखी रोटी थी मेरी क्या.. ?

तुमने कहीं पर देखी है...?

यमराज ने मुझ को प्यार किया ।

फिर गोद में ले कर समझाया ।

जिस रोटी की तू आस लिए ।

यूँ कब से भूखा सोता है ।

एक चोर बड़ी सी कोठी में ।

दांतो में दबा कर रखता है ।


Syed Fazeel Mohsin,

( Student, MBBS, AIIMS, Delhi )