जन्मदिन (1 जुलाई)पर भारत मां के वीर सपूत हमीद को कृतज्ञ राष्ट्र की भावभीनी श्रधांजलि !

जन्मदिन (1 जुलाई)पर भारत मां के वीर सपूत हमीद को कृतज्ञ राष्ट्र की भावभीनी श्रधांजलि !

जन्मभूमि के काम आया मैं बड़े भाग्य थे मेरे !

अपनी भारतीय सेना की गौरवशाली परंपरा की महत्त्वपूर्ण कड़ी परमवीर चक्र विजेता हवलदार अब्दुल हमीद ने वर्ष 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में जिस निर्भीकता और बहादुरी का प्रदर्शन किया था, वह सेना की कई पीढ़ियों के लिए आदर्श उपस्थित करती रहेगी। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में जन्मा देश का यह सपूत भारत-पाक युद्ध के दौरान खेमकरण सेक्टर में तैनात था। 10 सितम्बर, 1965 की सुबह 8 बजे पाकिस्तानी सैनिकों ने पैटन टैंक रेजिमेंट के साथ खेमकरण में आकस्मिक हमला बोल दिया था। वे हर दिशा में भारी गोलीबारी के सहारे भारतीय सैनिकों के व्यूह को तोड़ते हुए तेजी से आगे बढ़ रहे थे। स्थिति की गंभीरता और आसन्न पराजय को देखते हुए ग्रेनेडर इन्फेंट्री रेजिमेंट के कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद ने एक जीप पर अपनी गन चढ़ाई और भारी गोलीबारी के बावजूद पाकिस्तानी सैनिकों के बीच में घुस गए। जब उन्होंने पाक सेना के पहले टैंक को ध्वस्त किया तो पाक सैनिकों ने उन पर हमला बोल दिया। अपनी जान की परवाह न करते हुए उन्होंने एक के बाद एक उस समय तक अजेय माने जाने वाले कई पाकिस्तानी पैटन टैंकों को नष्ट किया और दर्ज़नों पाक सैनिकों को मार गिराया। पाक सेना में तबाही मचाते हुए अंततः हर तरफ से घिरा हुआ यह अकेला वीर सैनिक चक्रव्यूह में महाभारत के अभिमन्यु की तरह वीरगति को प्राप्त हुआ। उनकी शहादत ने भारतीय सैनिकों की हताश टुकड़ी में प्राण फूंक दिए और उन्होंने खेमकरण सेक्टर से पाक सैनिकों को मार भगाया। इस अनुपम वीरता के लिए हवलदार अब्दुल हमीद को मरणोपरांत भारतीय सेना के सर्वोच्च शौर्य सम्मान 'परमवीर चक्र' से नवाज़ा गया। शहीद अब्दुल हमीद इसके पूर्व 1962 के भारत-चीन युद्ध में चीनी व्यूह को तोड़कर पैदल भूटान तक पहुंच जाने वाली बहादुर भारतीय सैन्य टुकड़ी के जांबाज़ सिपाही थे जिन्हें युद्ध के बाद सैन्य सेवा मेडल, समर सेवा मेडल और रक्षा मेडल जैसे सम्मान दिए गए थे।