71 Views

IFWJ के दोनों गुटों को प्रेस काउंसिल ने सूचीबद्ध करने से किया इंकार, संगठन की मान्यता को लेकर पिछले 4 वर्षों से चल रहा न्यायालय में मुकदमा

IFWJ के दोनों गुटों को प्रेस काउंसिल ने सूचीबद्ध करने से किया इंकार, संगठन की मान्यता को लेकर पिछले 4 वर्षों से चल रहा न्यायालय में मुकदमा

(शाहनवाज़ हसन)

श्रमजीवी पत्रकारों के नाम पर देश भर में 3 पत्रकार संगठन प्रेस काउंसिल एवं भारत सरकार के ट्रेड यूनियन रजिस्ट्रार से पंजीकृत रहे हैं।सबसे पहले 28 अक्टूबर 1950 को IFWJ की स्थापना हुयी, जनवरी 1972 में NUJI एवं वर्ष 1989 में IJU की स्थापना IFWJ से टूट कर हुयी।

श्रमजीवी पत्रकारों के नाम पर बने पत्रकार संगठनों ने पत्रकारों के लिये कम संगठन में पद पर बने रहने के लिये लगातार पिछले 4 दशक से संघर्ष करते नज़र आये हैं। लगातार पत्रकारों की हत्या, पत्रकारों की पुलिसिया पिटाई, झूठे मुकदमे, इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में बड़े पैमाने पर छंटनी एवं समाचार पत्रों पर GST जैसे कई गंभीर मुद्दे पूरी तरह गौण हो गये हैं।इन सभी मुद्दों को गंभीरता से किसी पत्रकार संगठन ने कभी भी गंभीरता से नहीं उठाया, पत्रकारों की हत्या के उपरांत ज्ञापन-कैंडल मार्च निकाल केवल अपना कौरम पूरा करते आये हैं।इन सभी संगठनों में अधिकांश पदाधिकारी सेवानिवृत्त होने के उपरांत 65-75 वर्ष के आयु में स्वयं को श्रमजीवी पत्रकार बताते हुए उनकी लड़ाई लड़ने का दम भरते हैं।आज दिल्ली-मुंबई-कोलकाता सहित अधिकांश बड़े शहरों में कार्यरत्त श्रमजीवी पत्रकार इन संगठनों से जुड़ना नहीं चाहते,इनसे दूरी बनाये रखना चाहते हैं,वहीं आंचलिक पत्रकार संगठन के कार्यक्रम के नाम पर मुफ़्त पर्यटन का मज़ा लेने के लिये इन पत्रकार संगठनों से जुड़े रहते हैं।

IFWJ में टूट का सिलसिला 70 के दशक से लगातार जारी है।वर्ष 1989 में  IJU के गठन 

के बाद वर्ष 2015 में पुनः IFWJ टुकड़ों में बंट गया, दोनों ही गुट ने स्वयं को IFWJ की इकाई होने का न केवल दावा किया बल्कि राज्यों से मान्यता के नाम पर लगातार शुल्क भी वसूले।IFWJ(विक्रम) एवं IFWJ(परमानंद) ने एक दूसरे के विरुद्ध फौजदारी से लेकर जालसाज़ी तक के मुकदमे न्यायालय में दर्ज करवा रखे हैं।इन मुकदमों के निर्णय आने तक IFWJ के दोनों ही गुटों की मान्यता प्रेस काउंसिल एवं उत्तरप्रदेश सरकार ने समाप्त कर दी है।

यही हालत अब NUJI की भी हो गयी है, NUJI में श्रमजीवी पत्रकार के स्थान पर गैर पत्रकार को राष्ट्रीय कमेटी में पद देने का विरोध दिल्ली के श्रमजीवी पत्रकारों ने किया और एक अलग गुट बना लिया।दोनों ही गुट अब स्वयं को Original NUJI बताने के लिये एक दूसरे के विरुद्ध खड़े हैं।

झारखण्ड सहित देश भर के 18 राज्यों के पत्रकार संगठनों ने प्रेस काउंसिल सहित सूचना प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार से RTI कर यह जानकारी मांगी थी कि क्या IFWJ(विक्रम) गुट को सरकार की मान्यता प्राप्त है।इस RTI के जवाब में प्रेस काउंसिल ने कहा है चूंकि दोनों ही गुटों के मामला न्यायालय में लंबित है इसलिये दोनों ही गुटों के सूचीबद्ध करने पर निर्णय नहीं लिया जासका है।न्यायालय में मामला लंबित रहते दोनों ही गुटों ने राज्यों से मान्यता के नाम पर पिछले 4 वर्षों से सदस्य्ता देने के नाम पर वसूली जारी रखी है। IFWJ(विक्रम) गुट में एक ही व्यक्ति संगठन को अपनी निजी संपत्ति बनाकर शराब माफिया से लेकर अन्य धंदे में संलिप्त लोगों को राष्ट्रीय एवं राज्यों की कमेटी में पद देकर उनसे मोटी रकम की वसूली करते आये हैं।पत्रकार संगठनों की इस कार्यशैली एवं चाल चरित्र को देखते हुये देश भर के अधिकांश श्रमजीवी पत्रकार इनसे दूरी बनाये रखना चाहते हैं।झारखण्ड जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता शैलेंद्र सिंह को IFWJ(विक्रम) गुट के पदाधिकारियों के विरुद्घ मुकदमा दर्ज करने के लिये कहा है ताकि श्रमजीवी एवं आंचलिक पत्रकारों की गाढ़ी कमाई पर इन्हें डाका डालने से रोका जा सके।