तुम ज़रूर आना इस देश लाडो

        तुम ज़रूर आना इस देश लाडो


फौज़िया अफ़ज़ाल ( फ़िज़ा )

मै आज बहुत खुश थी। आज मेरा अल्ट्रासाउंड होना था, मेरा मन बैचैन था उस नन्ही सी जान को देखने को, जो मुझ में कहीं जी रही थी।

मुझे स्क्रीन पर एक तस्वीर दिखाई दी, एक काला भंवर सा था, बीच में हिलोरे लेती हुई एक नन्ही सी जान, जीती जागती, आकार धुंधला सा था , पर मेरे मन और मस्तिक्ष में उसकी पूरी छवि बन गई।
अचानक किसी आवाज़ ने मुझे झंझोड़ा , आंखे जो एक टक उस स्क्रीन को देख रही थी, अब कानों का साथ देने लगी, देखने लगी उन लोगो के चेहरों की ओर ,जिन पर एक रंग आ रहे थे एक रंग जा रहे थे।

“गर्ल चाइल्ड”,एक दबी सी आवाज़ गूंजी

इससे पहले भी मै हर महीने आती थी अल्ट्रासाउंड के लिए तब तो मैने यह आवाज़ नहीं सुनी आज यह आवाज़ क्यों उठी?
अब मुझे साजिशों की बू आने लगी।
“नहीं चाहिए”, जिसने भी कहा सुनकर मेरा मन चीख उठा।
नहीं चाहिए …मतलब?
जब तक मैं सोचती , एक आवाज़ आई आपको चलना होगा दूसरे कमरे में , पर क्यों ?
ना मुझ से पूछा गया , ना मुझे कुछ बताया गया, ले गए मुझे ज़िंदा लाश की तरह ,
मुझे ना बात का मोका दिया गया ना मेरी मर्ज़ी पूछी गई।

यह थी एक औरत एक मां…..
लाद दिए अपने फैसले मुझ पर , नहीं चाहिए थी उनको शायद मेरी जैसी एक और औरत , इस दुनिया में जो बेबस थी ,लाचार थी, बेसहारा थी, सिर्फ पुरुष प्रधान समाज में एक कठपुतली की तरह रह रही थी।

अपनी बेबसी देख कर तो मुझे भी नहीं चाहिए थी एक और औरत इस समाज में….
जहां से आईं थी वहीं चली जाएगी…

अच्छा हुआ बच जाओगी तुम …..

बच जाओगी ज़ालिम नज़रों से
बच जाओगी जाहिल समाज से
बच जाओगी बलात्कार से

बच जाओगी दहेज के लोभ से

बच जाओगी ज़िंदा जलने से

बच जाओगी आत्मसम्मान को बार बार ठेस पहुंचाने से

बच जाओगी मां बाप की इज्ज़त का बोझ ढोने से

बच जाओगी ज़िंदा लाश बनकर जीने से

बच जाओगी तानो से

बच जाओगी पूरी उमर हाथ फैलाने से

बच जाओगी उमर भर घर बाहर खटने से

बच जाओगी उन ज़िम्मेदारियों से जिसमें किसी का सहारा नहीं होता

बच जाओगी हर उस दर्द से जो सिर्फ आंखो से बाहर निकालता है

बच जाओगी मेरी तरह बेबस होने से

बच जाओगी कोख को उजाड़ने से

बच जाओगी मर्दों की जलन और हसद से

बच जाओगी मेरी तरह एक और कत्ल करने से

मैं मां थी ममता से बंधी थी सोच भी मां की तरह रही थीं….

इस खामोश सन्नाटे में एक आवाज़ ने मेरी सोच को तोड़ा…

“काम हो गया”
इनको दूसरे वार्ड में शिफ्ट कर दो, थोड़ी देर में होश में आ जाएंगी।

क्या कहा होश में????

होश में तो मैं हूं,
दिल में इतना दर्द था कि शरीर के दर्द का एहसास ही नहीं हुआ।
दिल ने चाहा चीखू चित्कार करूं, पर किस बात के लिए इस वक़्त तो मै ही मुजरिम थी , और सजा भी दे दी गई थी।
शरीर बेबस था। उठ भी नहीं सकती थी। आंसू आखों के किनारों से बह रहे थे ….

गिला, शिकवा किससे करती..

खुद से गिला था की मैं एक औरत हूँ,और शिकवा खुद के वजूद से जिसमे एक बच्ची की जान थी …

आंसू और बेहोशी के कारण सब कुछ धुंधला नज़र आ रहा था ,देखना चाह रही थी कौन थे वो लोग ? जो मेरे मन की एक चीत्कार भी न सुन पाए ,ज़बान चाह रही थी उनसे बहुत कुछ पूछना पर दम ही कहाँ था मुझ मे..

तभी आखों ने धुंधली एक छाया देखी जिसके हाथ में एक काली पालीथीन थी । शायद अब वो नन्ही कली उसमे थी जिसको नोच नोच के उखाड़ा गया।
किसको रहम आता और क्यों….
सिर्फ तकनीक ही तो बदली है सोच तो आज भी वही है जो सालो पहले थी।

पर….

मुझे उम्मीद हैं तुम फिर आओगी
कुछ साल गुजरेंगे, शायद कुछ सोच बदलने का नाटक करेंगे….और ज़यादा तकनीक बढ़ेगी ,दौर कुछ और बदलेगा

तुमको आने देंगे इस संसार में…कुछ अपने लालच के लिए, कुछ दुनिया दिखावे के लिए ही सही …

जो मुसीबतें आज हैं, वो फिर भी आएंगी…पर तुम आओगी अभिमान के साथ इस संसार मे

 उसके बाद समाज की हर बुराइयों से तुम निकल जाना ,

बचा के रखना खुद के अस्तित्व को,
आत्मसम्मान को,
नहीं झुकना तुम किसी भी परिस्थितियों के आगे,
नहीं होना बेबस लाचार ,

पढ़ना और खुद को साबित करना,
छोड़ देना हर उस इंसान को जो तुमको काम आंके, तुमको बढ़ने से रोके,
मेरी तरह नहीं उजाड़ना तुम अपनी कोख,
मेरे साथ कोई नहीं ,
पर उस वक़्त मै खड़ी रहूंगी, आंच नहीं आने दूंगी औरत के स्वाभिमान पर,
हारी नहीं हूं मैं,
आज और भी मजबूत हो गई,

मुझे जीना होगा लाना होगा तुम्हे वापिस इस दुनिया में,
फिर कितनी भी साजिशे हों या चालाकियां…

एक माँ को एक औरत को लड़नी होगी अपने अस्तित्व की लड़ाई …

इसलिए …

तुम ज़रूर आना इस देश लाडो….