भीम चूल्हा के महत्व को जाने, क्यों लगता है मेला।

ऐतिहासिक 'भीम चुल्हा' मेला 14 को,सुरक्षा के घेरे में रहेगा पावन स्थल

मोहम्मदगंज स्थित  भीम चुल्हा के समीप मकरसक्रंति पर लगने वाला मेला  में पलामू, गढ़वा जिला के अलावा  बिहार  सीमा पर स्थित गांव के लोग पहुचते है।इस स्थान का  पौराणिक व ऐतिहासिक महत्व के कारण इसका महत्व है। मेला में आने वाले लोग  कोयल नदी का पवित्र स्नान कर भीम चूल्हा के प्राचीन शिव मंदिर में जलाभिषेक करना नही भूलते है। सरकार को  प्रति वर्ष  अच्छा राजस्व देने वाला मेला मे सुविधाओं का घोर अभाव है। उक्त स्थल को महाभारत कालीन  व अंग्रेजी सियासत से भी जोड़कर देखा जाता है।जंगल, पहाड़ व नदियों का संगम बरबस अपनी ओर आकर्षित करती है। इस स्थान के बारे में चर्चा होती है कि  महाभारत के पात्र व अंग्रेजों को इस स्थान पर जंगली जानवरों का शिकार खेलने का पसंदीदा स्थान रहा है। नदी पार कर गढ़वा व बिहार के रोहतास जिला क़े कई गांव के लोग पंहुचकर मेला का आंनद लेते है। घरेलू सामान की खरीद , खाने पीने का लुत्फ व मनोहारी स्थान का अवलोकन कर  ही लोग वापस  लौटते है। इस बार के मेला के लिए मध्यप्रदेश के कारीगर  राम सिंह व उसकी पत्नी  किसानों को काम आने वाले लोहे के कई उपकरण का निर्माण करने में जुटे हैं।  वो मेला में उसे बेचने  की तैयारी जोर शोर से कर रहे हैं। इस मेला का महत्व आज भी है। 80 बरस बाद भी इस मेले की रौनक कम नही हुई है।अब तो सरकारी पहल पर इस स्थान को विकसित करने की भी योजना है।इसके लिये भीम चुल्हा विकास समिति  का गठन भी कर लिया गया है। सरकार इस स्थल को पर्यटन स्थल के रूप में  विकसित करने की  प्रक्रिया शुरू कर दी है। गत माह पलामू के उपयुक्त शांतनु कुमार अग्रहरि ने इस स्थल का भ्रमण कर योजनाओं पर काम शुरू कर दिया है।

सुरक्षा व्यवस्था: मेले में शांति व सुरक्षा को लेकर थाना प्रभारी वीरेंद्र पासवान ने  कहा है कि सुरक्षाबल के घेरे में रमणीक स्थल को रखा जायेगा।  किसी भी तरह के व्यवधान उतपन्न करने वालों के विरुद्ध सख्त कार्यवाई होगी चाहे बो कोई भी हो।