आरा की वह दुनिया और राजेश कुमार का नाटक : हिन्दू कोड बिल

                            आरा की वह दुनिया और राजेश कुमार का नाटक : हिन्दू कोड बिल 

प्रेमकुमार मणि 


पिछली सदी में सत्तर के दशक में आरा जीवन्त शहर हुआ करता था . पटना से कोई साठ किलोमीटर की दूरी पर बसा यह शहर राजनीतिक गतिविधियों - खासकर नक्सलबादी  वाम आंदोलन - का केंद्र था . आरा के बगल में स्थित है एक गांव धमार ,जहाँ के पुराने कम्युनिस्ट नेता सत्यनारायण सिंह ने बिहार में इस आंदोलन की नींव रखी थी . कुछ ही समय बाद भोजपुर को लाल इलाका कहा जाने लगा . सन तीस के दशक में यह इलाका पिछड़ी जातियों के राजनीतिक -सामाजिक आंदोलन त्रिवेणी संघ का केंद्र था . चालीस के दशक में ख्यात कम्युनिस्ट मानवेन्द्र नाथ राय के रेडिकल ह्युमैनिस्ट का और सन पचास  के बाद लोहिया के समाजवादी आंदोलन का केंद्र रह चुका था . आरा शहर इस पूरे जनपद का केंद्र था , इसलिए इसका हर गली -चौराहा बहस -मुहाबसों से चंचल बना रहता था . 1972 के पूर्व यह एक ही जिला था शाहाबाद ,जो अब चार जिलों यथा भोजपुर ,बक्सर , रोहतास और कैमूर में विभक्त हो चुका है . इस इलाके पर पत्रकार कल्याण मुखर्जी और एक स्थानीय वकील राजेंद्र यादव ने अंग्रेजी में एक किताब लिखी है ,जिसमे विस्तार पूर्वक पूरे इतिहास की चर्चा है . 


 आरा साहित्य-संस्कृति  का भी वैसा ही जीवन्त केंद्र था . पटना से कहीं  अधिक महत्वपूर्ण . किसी समय यहां नलिनविलोचन शर्मा , कुमार विमल ,  विजय मोहन सिंह , गोविन्द मिश्र , रमेशकुन्तल मेघ आदि किसी न किसी रूप में रह चुके थे . सन सत्तर के दशक में यहीं से आलोचक चंद्रभूषण तिवारी ने  "वाम " नाम से चर्चित पत्रिका निकाली थी ,जिसके बस दो अंक निकले ,लेकिन साहित्य जगत  में तूफान आ गया . कथाकार मधुकर सिंह ,मिथिलेश्वर , कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह , विजेंद्र अनिल  से लेकर श्रीराम तिवारी , अरविन्द गुप्त , रामेश्वर उपाध्याय , नीरज सिंह , रामनिहाल गुंजन , श्रीकांत ,नवेन्दु , सिरिल मैथ्यू ,कुमार नयन आदि अनेक लेखक -संस्कृतिकर्मी ,जो इस जनपद या शहर से जुड़े थे , सक्रिय थे . पूरे हिंदी साहित्य संसार में आरा की सक्रियता चर्चित थी . 


 मैं 1975 -76 में आरा से जुड़ा और जल्दी ही इसकी धड़कन का हिस्सा बन गया . कुछ ही समय बाद यहां के युवा मित्रों ने एक नाट्य संस्था बनायीं -" युवा नीति" . यह युवा संस्कृतिकर्मियों की एक चलती -फिरती संस्था थी ,जो मुख्य  रूप से नुक्कड़ नाटकों के  प्रदर्शन करती थी . खास बात यह थी कि इससे जुड़े सभी लोग राजनीतिक रूप से काफी सचेत थे . रामेश्वर उपाध्याय ,श्रीकांत ,नवेन्दु , सलिल सुधाकर , सुभाषचंद्र  सरकार , सिरिल , बिंध्येश्वरी ,सुदामा आदि सब अपनी- अपनी खूबियों केलिए जाने जाते थे . रामेश्वर तो अब इस दुनिया में नहीं हैं और वर्षों से सुभाष सरकार की भी कोई खबर नहीं है , लेकिन बाकी सब आज भी सक्रिय हैं . श्रीकांत और नवेन्दु ने पत्रकारिता में ख्याति अर्जित की .तो सलिल और सिरिल ने साहित्य के क्षेत्र में . सुदामा मार्क्सवादी -लेनिनवादी कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक हैं . अन्य अनेक नाम छूट भी रहे हैं . जैसे कवि और जाने -माने इतिहासकार बद्रीनारायण ,जो उन दिनों बहुत खिच्चा थे .  लेकिन इन सब के  बीच से मैं चर्चा केलिए निकाल रहा हूँ राजेश कुमार को , जो उन दिनों इंजीनियरिंग की पढाई कर रहे थे और कम बोलते थे . उनके पिता का वहां पदस्थापन था . 


 बहुत दिनों से राजेश से मुलाकात नहीं है . हाँ ,उनकी सक्रियता से थोड़ा वाक़िफ़ हूँ . फिलवक्त , मेरी जानकारी के अनुसार , वह अभियंत्रण सेवा में ऊँचे ओहदे पर हैं ,लेकिन यह तो उनका पेशा है . नाटकों की दुनिया में उन्होंने बहुत खास जगह बनाई है और निरंतर सक्रिय हैं . महत्वपूर्ण यह भी है कि नाटकों में उन्होंने राजनीतिक -सामाजिक विषयों को लगातार उठाया है ,जो अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण कार्य है .  


        अभी मेरे सामने उनका नाटक है ' हिन्दू कोड बिल ' , जो संजीव चन्दन द्वारा सम्पादित पत्रिका -' स्त्रीकाल ' के ताज़े अंक ( जनवरी मार्च 2018 ) में प्रकाशित है . मैं एक साँस में इसे पढ़ गया और अभिभूत हूँ . नाट्यकला की मुझे विशेष जानकारी नहीं है , जितना जानता हूँ ,उसके आधार पर कह सकता हूँ, मंच के निकष पर  यह खरा उतर पायेगा . मेरे अनुमान से ,सीमित साधनों से भी इसका मंचन संभव हो सकता है . लेकिन इन सबसे अलग मेरे उल्लास का कारण इस नाटक में वर्णित आंबेडकर के जीवन का उत्तरकाल और तत्कालीन भारतीय राजनीति में उनकी प्रासंगिकता है . विद्वत मंडली में  इस बात की बहुत कम चर्चा हुई है कि आज़ादी के बाद किस तरह सामाजिक प्रतिगामी तत्वों ने भारतीय गणतंत्र को अपने गिरफ्त  में लेने की कोशिश की थी .इसकी चिंता आचार्य नरेन्द्रदेव ने अपने उस लेख में की है ,जिसमे उन्होंने कांग्रेस से सोशलिस्टों के अलग होने की पृष्ठभूमि बतलायी है .सामाजिक प्रतिक्रियावादी ताकतें काफी सक्रिय थीं . नेहरू ,आंबेडकर और दूसरे प्रगतिशील सकते में थे . गाँधी ने अपने व्यक्तित्व का इस्तेमाल कर नेहरू को प्रधानमंत्री तो बनवा दिया था ,लेकिन कांग्रेस पर कंज़र्वेटिव समूह हावी था . हिन्दू कोड बिल जब पार्लियामेंट में रखा गया ,तब इसे लेकर पूरे मुल्क का सामंती -पुरोहिती तबका नग्न रूप में सामने आ गया . कांग्रेस के अंदर ऐसे तत्व काफी ताकतवर थे . पटेल अब नहीं थे ,लेकिन उनके चेले थे . उन सब ने आंबेडकर का जीना मुहाल कर दिया था . इस नाटक में आंबेडकर का वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष बखूबी देखा जा सकता है . आखिर समय पर नेहरू भी उन्हें धोका दे गए ,क्योंकि उन्हें अपना प्रधानमंत्रित्व बचाना था . कम्युनिस्टों और सोशलिस्टों को आर्थिक मुद्दों के अलावे कुछ और दीखता नहीं था . सच कहा जाय तो सामाजिक इंक़लाब की लड़ाई आंबेडकर बिलकुल अकेले लड़ रहे थे . इतिहासकार उन्हें केवल दलित प्रश्नों से जोड़कर देखते हैं .लेकिन सच्चाई यह है कि आंबेडकर ने अपने जीवन की सबसे अहम लड़ाई स्त्रियों खासकर हिन्दू स्त्रियों केलिए लड़ी थी . दलित स्त्रियों के मुक़ाबले सवर्ण स्त्रियों का दमन -शोषण अधिक था और यह हिन्दू कोड बिल उनके ही पक्ष में था .इस पक्ष पर सोचने केलिए यह नाटक उत्प्रेरित करता है . 


 राजनीतिक नाटक लिखना मुश्किल कार्य है ,यह मैंने पहले ही बतलाया है . इसके लिए अपेक्षित शोध और चिंतन नहीं हुआ तो गुड़ के गोबर होते देर नहीं लगती . लेकिन राजेश बधाई के पात्र हैं कि तत्कालीन राजनीतिक -सामाजिक स्थितियों , क़ानूनी मसलों , संसद की बहसों और आंबेडकर के घरेलु जीवन को बखूबी अभिव्यक्त  किया है . राजेंद्र प्रसाद की दकियानूस भूमिका और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की चालाकियों को ठीक से लेखक ने पकड़ने की कोशिश की है . श्यामाप्रसाद मुखर्जी जानते थे कि कांग्रेस वैचारिक रूप से विखंडित है और उसमे निहित प्रगतिशील पक्ष भी मुसलमानों के तुष्टिकरण को लेकर उधेड़बुन में है . इसलिए जब मुखर्जी ने कॉमन सिविल कोड का प्रस्ताव किया तब कांग्रेस चुप लगा गई . कांग्रेसी सेक्युलरवाद की ओट में हिन्दू और मुस्लिम सामाजिक प्रतिगामिता कैसे पल -पुस रही है ,इसे नाटक से गुजरते हुए  समझा जा सकता है . मैं चाहूंगा कि इस नाटक का अधिक से अधिक मंचन हो ,ताकि नई पीढ़ी उस दौर को समझ सके .


 आंबेडकर कितने और कैसे महत्वपूर्ण हैं और कितना विकट संघर्ष उन्होंने अपने जीवन के आखिर में किया था ,इसे कम लोग जानते हैं . अधिक से अधिक लोगों को इसे जानना चाहिए .