156 Views

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी माना हैं कि मामले को निस्तारण में मध्यस्थता से अच्छा विकल्प कुछ और नही हो सकता।यही बजह है कि अधिकांश मामले मध्यस्थता केंद में भेजे जा रहे है।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय  ने भी माना हैं कि मामले को निस्तारण में मध्यस्थता से अच्छा विकल्प कुछ और नही हो सकता।यही बजह है कि अधिकांश मामले मध्यस्थता केंद में भेजे जा रहे है।और इसका सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहा है।देश के सभीजिले में भी मध्यस्थता केंद कार्य कर रहा है।जहां सिविल व आपराधिक बादो के अलावे पुराने व जटिल मामले के निष्पादन में मध्यस्थ केंद महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा हैं।इससे समय व पैसे की बचत तो हो ही रहा हैं।साथ ही पक्षकारों में बैमनास्ता भी मिट जा रहा हैं।  माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अयोध्या मामले को मध्यस्थता से हल करने के लिए 3 मध्यस्थ  तय कर दिए गए हैं । सुप्रीम कोर्ट के द्वारा यह ऐतिहासिक कदम उठाया गया है। मध्यस्था के महत्व को आज समझने की जरूरत है ।आखिर मध्यस्था है क्या ?मध्यस्थता में मध्यस्थ की सहायता से विवादों को निपटाने का प्रयास है ,जो कि एक तृतीय पक्ष है। एक मध्यस्थ बातचीत के जरिए सभी पक्षों को मैत्रीपूर्ण तरीके से विवाद निपटाने में सहायता करता है ।वह सभी पक्षों को आपस में स्वीकार करने योग्य करार दिलाने में मदद करता है। अगर सभी पक्ष संतुष्ट ना हो तो उनके लिए समझौते की शर्तें मान्य आवश्यक नहीं है। क्योंकि न्यायाधीश और पंचों के फैसले सभी पक्षों पर लागू होते हैं लेकिन मध्यस्थ पक्षों को मुकदमे के संभावित निष्कर्ष का मूल्यांकन करने में  मदद करता है ।ताकि वे स्वीकार करने योग्य समझौते तक पहुंच सके। मध्यस्था करवाई में न्यायालय या पंच की औपचारिक विधियां नहीं होती, ।दोनों पक्ष और उनके अधिवक्ता पहले से निर्धारित विधियों या कोई साक्ष्य के नियमों का पालन न करते हुए मुक्त रूप से भाग लेते हैं। औपचारिकता के अभाव में उन्हें अवश्य मिलता है कि मुद्दों पर खुले वातावरण में विचार-विमर्श कर सकें और अपने विचारों को दूसरे के सामने प्रकट कर सकें ताकि वे अपने हित के पक्ष में निष्कर्ष निकलवा सके। अगर आवश्यक हो ते एक मध्यस्थ बिबादित पक्षों  से अकेले या निजी रूप से मिल सकता है ।ऐसे बैठके पूर्णतया गोपनीय होती है। और उनका उद्देश्य सभी पक्षों की जरूरतों को समझना होता है और उनके होते तक पहुंचने में क्या समझना होता है।सर्वोच्च न्यायालय के पहल पर आपसी वार्ता से अयोध्या विवाद का हल निकल आता है तो किसी भी पक्ष को निराशा का सामना नहीं करना पड़ेगा ।आपसी सहमति को हासिल समाधान न केवल संबंधित पक्षों में सद्भाव बढ़ेगा बल्कि देश में भी सद्भावना व मैत्री की भावना का संचार करेगा। क्या इससे बेहतर और कुछ हो सकता है कि अयोध्या मामले का हल इस तरह से ही हो कि कोई भी पक्ष हार या जीत की भावना से ना भरे। यह सही है कि किसी निष्कर्ष तक पहुंचना कठिन काम है लेकिन यह भी मुमकिन है कि किसी भी मामला का हल बातचीत व मध्यस्थता से न हो सके। उम्मीद है कि जल्द ही मध्यस्था के महत्व को समझना आम जनों के लिए जरूरी है। क्योंकि आज अधिकांश मामले जानकारी के अभाव में ही लंबे समय तक  खिंचे जा रहे है।आज समय आ गया है मध्यस्थता के महत्त्व को समझे व मामले का जितना हो सके निस्तारण कराये।आज सभी जिला में मध्यस्त की संख्या बढ़ाने की जरूरत है।व आम अवाम को प्रेरित करने की जरूरत है।अयोध्या मामला का हल अगर मध्यस्थ निकाल देते हैं तो निश्चित रूप से लोग अब पुराने व जटिल मामले का निस्तारण मध्यस्थता केंद्र ही सुलझाएंगे। संतोष कुमार पांडेय ,पैनल ,अधिवक्ता, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण पलामू ,झारखण्ड।