कांग्रेस के खाते में गयी चतरा लोकसभा सीट,राजनीतिक दावँ पेंच में फंसा राजद

झारखंड में महागठबंधन ने की लोकसभा सीट की घोषणा


कांग्रेस के खाते में गयी चतरा लोकसभा सीट,राजनीतिक दावँ पेंच में फंसा राजद 

चन्द्रेश शर्मा. चतरा,25 मार्च: महागठबंधन ने चतरा लोकसभा सीट की घोषणा कर दी है। घोषणा के मुताबिक चतरा सीट कांग्रेस के खाते में गयी है।महागठबंधन के इस फैसले के बाद बिहार के बालू व्यवसायी और राजद के प्रबल प्रत्याशी सुभाष प्रसाद यादव का हाल यह हो गया ।" दिल के अरमां आंसुओं में बह गए,हम वफ़ा करके भी तन्हा रह गए"। अपने हाल पर बेहाल राजद के रहनुमा दोस्ताना संघर्ष के नाम पर चतरा सीट छोड़ने के लिए तैयार ही नहीं हो रहे। रांची में महागठबंधन के घटक दलों द्वारा आयोजित प्रेस कांफ्रेंस का बहिष्कार करके राजद ने चतरा सीट पर दोस्ताना संघर्ष का इशारा कर दिया है। वहीं 2014 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ो पर गौर करें तो लोकसभा क्षेत्र में राजद के वजूद पर सवालिया निशान खड़ें हैं। इस चुनाव में भाजपा के बाद कांग्रेस दूसरे नम्बर पर रही थी। इस परिस्थिति में राजद का चतरा सीट पर कोई दावा नहीं बनता। आपको बताते चलें कि वर्तमान समय मे बिहार के बालू व्यवसायी सुभाष यादव के चतरा प्रवेश के बाद चतरा राजद दो फाड़ में तब्दील हो गया । चतरा जिला में राजद के जमीनी नेता चंद्रदेव प्रसाद यादव और पूर्व विधायक जनार्दन पासवान को अपनी प्रतिष्ठा बचानी मुश्किल हो गयी। इस बाबत राजद के जमीनी कार्यकर्ताओं की माने तो बिहार के व्यवसायी सुभाष प्रसाद यादव ने आते ही रुपये पैसे का दम्भ दिखाना प्रारम्भ कर दिया। बिहार से बालू व्यवसायियों और नेताओं की एक बड़ी टीम क्षेत्र का दौरा करने में लगी रही। इनकी व इनके समर्थकों के बढ़ते हौसलों और स्थानीय कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का ही परिणाम रहा कि संगठन में बची-खुची जान भी धीरे धीरे निकल गयी। अभी क्षेत्र में पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं ने दूसरे दलों की ओर रुख कर लिया है। महागठबंधन में कांग्रेस के खाते में चतरा सीट जाने से जहां एक ओर कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में खुशी का माहौल हैं , वहीं राजद के उपेक्षित कार्यकर्ताओं ने भी महागठबंधन प्रत्याशी को ही समर्थन देने का मन बना लिया है। अब देखना यह है कि महागठबंधन से कांग्रेस का कौन सा प्रत्याशी मैदान में उतारती है। आपको बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर की हवा में कांग्रेस की सीट उड़ गई थी। परन्तु इस बार की फिंजा कुछ अलग कहानी कह रही है। 2014 के लोकसभा में तीसरे नम्बर पर रही झाविमो महागठबंधन में कांग्रेस के साथ एकजुट है। वर्तमान समय मे क्षेत्र में झाविमो का संगठन काफी मजबूत स्थिति में है। झाविमो नेत्री नीलम देवी के भाजपा में शामिल होने से कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है। झाविमो युवा नेता सुभाष सिंह की माने तो पार्टी आज भी मजबूत स्थिति में है। सुभाष सिंह ने कहा कि महागठबंधन में सीट जाने की संभावना के बाद पिछले कई दिनों से नीलम देवी विभिन्न दलों के चौखट पर घूम रही थीं। इसलिए किसी के आने जाने से पार्टी पर कोई प्रभाव नहीं है। महागठबंधन में शामिल झारखंड मुक्ति मोर्चा  का लोकसभा क्षेत्र में अच्छी पकड़ बताई जाती है। पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का क्षेत्र में ऊंचा कद है। इस परिस्थिति में राजद अगर दोस्ताना संघर्ष में प्रत्याशी उतारती भी है तो महागठबंधन को कुछ खास फर्क नहीं पड़ेगा। जहां तक चुनाव में हार-जीत का सवाल है,तो यह तभी संभव हो पाएगा जब प्रत्याशी के नाम की घोषणा होगी।अभी तक देश की प्रमुख पार्टी न तो भाजपा ने और न ही महागठबंधन ने अपने प्रत्याशियों की घोषणा की है। इस परिस्थिति में सबकी निगाह इनदोनो पर टिकी है। आम जनमानस में दोनों राजनीतिक संगठनों पर स्थानीय प्रत्याशी देने का दवाब है। अगर दोनों में से किसी ने भी स्थानीय प्रत्याशी देने की हिम्मत दिखाई तो वह बाजी मार ले जाएगा। बहरहाल देखना यह दिलचस्प होगा कि आखिर ऊंट किस करवट बैठता है।