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दोस्ती हो या दुश्मनी सलामी दूर से अच्छी लगती हैं, राजनीति में कोई सगा नहीं ये बात भी सच्ची लगती हैं'

 चुनावचक्र

'दोस्ती हो या दुश्मनी सलामी दूर से अच्छी लगती हैं,

राजनीति में कोई सगा नहीं ये बात भी सच्ची लगती हैं'

उपर के शैर के साथ निम्नांकित बातें देश की मौजूदा सियासी परिदृश्य को समझने के लिए काफी है।  चाणक्य ने कहा था कि 'लालची और मौकापरस्त लोगों को उनकी मनचाही वस्तु देकर वश में किया जा सकता है। क्योंकि इस प्रकार के लोगों का मनोरथ अगर सिद्ध नहीं होता तो वे छोड़कर चले जाते हैं'

अब तो आप समझ ही रहे होंगे की हमारा इशारा किधर है? दरअसल यही चरित्र है देश की कई सियासी पार्टियों का, जिनका चरित्र दशकों से देश मे परम्परा में घुन बन कर अंदर तक पेवस्त है। अपने हिसाब से लगभग सारी पार्टियां शतरंज की बिसात सजा लेती हैं लेकिन कभी भी पीछे मुड़ कर देखने की जहमत नहीं उठाती की आम जनता के जज़्बात क्या हैं? आलम ये है कि जब चाहो, जिसे चाहो अपना रहबर बना लो और फिर चारण गान शुरू। अब सवाल है कि देश की सियासत का ये चेहरा बदलता क्यों नहीं क्यों जनता की दिल की आवाज़ पर देश की सियासी पार्टियों के प्रत्याशी तय नहीं होते? अधिकांश मतलब-परस्त, अपराधी, धन-कुबेरों और दबंग ही देश की सियासत में चांदी क्यों काटते हैं? क्यों आम आदमी बस चुनाव लड़ने की हसरत लिए देश के महान लोकतंत्र की तरफ ताकता रह जाता है? हालांकि ये चरित्र नया नहीं है लेकिन है कमाल कि बात कि देश की सियासत जिसकी लाठी उसकी भैंस की कहावत की तरफ तेज़ी से बढ़ चुकी है। ये बानगी भी देखिए चुनाव आते ही नेता कपड़े की तरह पार्टियां बदलतें हैं साथ ही पैसों का खेल भी खेलते हैं बकौल राना साहब:  'सियासत मुँह भराई के हूनर से ख़ूब वाकिफ है, हर किसी के आगे शाही टुकड़े डाल देती है...

वैसे भी राना साहब देश में शाही टुकड़े डालने की नरेटी भर आज़ादी हो और शाही टुकड़े उठाने वालों की लंबी फेहरिश्त तो टुकड़े तो फेंके ही जायेंगे...

बरहाल देश की मौजूदा सियासी तपिश में अभी क्या-क्या पिघलने वाला है बस देखते जाइये, साथ ही उस पिघले लावे से क्या कुछ सियासी मेटल बनने वाला है इसका भी इंतज़ार कीजिये। साथ ही एक काम और साथ में करते जाइये अपने विवेक की कसौटी पर तमाम प्रत्याशी और दलों को भी कसते जाइये, ताकि सोने (सियासत) की वास्तविक सुंदरता सामने आ पाए।

इसी मसले पर गांधी जी ने भी कई बातें कही थी मसलन 'एक समाज के तौर पर मनुष्य ने अपने अनुभवों से सीखा है कि बोलने और लिखने जैसी नैसर्गिक आज़ादी का भी हमने आत्मघाती होने की हद तक दुरूपयोग किया है. तरह-तरह के छद्म और प्रकट मुखपत्रों के जरिए अफवाह, सांप्रदायिक वैमनस्यता और हिंसा तक फैलाने के कार्य होने लगते हैं. ऐसे अपवादजन्य और अवांछित दुरुपयोगों को रोकने के लिए संविधान-निर्माताओं ने अपरिहार्य परिस्थितियों में ही इसके लिए विवेकपूर्ण मर्यादाएं भी तय की थीं. लेकिन ये मर्यादाएं इसलिए नहीं तय की गईं थीं कि शासन-व्यवस्था या सरकारें ही ऐसे प्रतिबंधों का दुरुपयोग करने लग जाएं. तो फिर ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए हम क्या करें? तब गांधी जी का सुझाव था ‘हमारे यहां पत्रकार संघ है. वह एक ऐसा विभाग क्यों न खोले, जिसका काम विभिन्न समाचार-पत्रों को देखना और आपत्तिजनक लेख मिलने पर उन पत्रों के संपादकों का ध्यान उस ओर दिलाना हो?’ इस शोर-शराबे में इससे पहले कि हम ठीक-ठीक समझ भी पाएं कि यह हो क्या रहा है, एक बात हमेशा याद रखने की है कि हम किसी भी संप्रदाय, विचारधारा, राजनीतिक दल और पक्ष-विपक्ष भी कम से कम तभी हो पाएंगे, जब बोलने और लिखने का हमारा अपना नैसर्गिक और अविच्छेद्य अधिकार सुरक्षित रहेगा. इसमें हमें किसी शासन-व्यवस्था, सरकार, संगठन या राजनीतिक दल की चालाकी नहीं चलनी देनी चाहिए. किसी भी प्रलोभन में आकर, किसी भी क्षणिक राजनीतिक लाभ के लिए, किसी भी कीमत पर हम अपनी यह आज़ादी न खोएं. जनता भी यह याद रखे कि उसके पास सवाल उठाने का अधिकार रहेगा, तभी वह प्रेस और सरकार दोनों पर सवाल उठा पाएगी....

खैर गांधी जी कि ये बातें कितनी प्रासंगिक हो पाएगी वर्तमान से उसका कितना गहरा नाता है ये अपनी अपनी समझ की बात है साथ ही ये सारी बातें जनता के विवेक पर भी निर्भर करता है, खास कर देश के उस प्रबुद्ध तबके पर जिसके कंधों पर देश की उन्नति का बागडोर है जो अपने हिसाब से देश में एजेंडा खड़ा करता है।


संपादकीय

अरविंद प्रताप

सीनियर जर्नलिस्ट

रांची