मैं ऐसे तमाम लोगों को जानता हूँ जो भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन चलाते हैं लेकिन जब भ्रष्ट होने का मौका मिला,खुद को बचा नहीं पाए।दहेज विरोध पर लम्बे-लम्बे भाषण दिए लेकिन घर में एक भी शादी बिना दहेज के नहीं कर पाए।नारी स्वातंत्र्य और नारी समानता की वकालत करने में तर्क और दलील से सबको पछाड़ दिया,लेकिन किसी भी सार्वजनिक मुद्दे पर उनके घर की बहू-बेटियाँ घर की चौखट नहीं लाँघ सकी।

मैं ऐसे तमाम लोगों को जानता हूँ जो भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन चलाते हैं लेकिन जब भ्रष्ट होने का मौका मिला,खुद को बचा नहीं पाए।दहेज विरोध पर लम्बे-लम्बे भाषण दिए लेकिन घर में एक भी शादी बिना दहेज के नहीं कर पाए।नारी स्वातंत्र्य और नारी समानता की वकालत करने में तर्क और दलील से सबको पछाड़ दिया,लेकिन किसी भी सार्वजनिक मुद्दे पर उनके घर की बहू-बेटियाँ घर की चौखट नहीं लाँघ सकी।

    .....लेकिन,बहुत फख्र के साथ हम अपने शहर के एक परिवार की चर्चा कर सकते हैं,जिसने रक्तदान और अंगदान पर भाषण ही नहीं दिए,लेख ही नहीं लिखे ,उपदेश नहीं झाड़े बल्कि ऐसा महादान करके उदाहरण प्रस्तुत किया,मिसाल कायम की।.....जी हाँ!मैं बात कर रहा हूँ उस परिवार की,जिसका वर्तमान में स्थानीय प्रतिनिधित्व करते हैं श्री आलोक वर्मा उर्फ भोलू भैया।

        इस परिवार के ही पिछली पीढ़ी के सदस्य थे-यदुवंश सहाय-भारतीय संविधान निरूपण समिति के सदस्य और पलामू के प्रथम साँसद।यदुवंश सहाय के अनुज थे उमेश्वरी चरण उर्फ लल्लू बाबू,जो 1957 में डालटनगंज विधान सभा क्षेत्र से विधायक चुने गए।इसी परिवार के सदस्य थे मदन कृष्ण वर्मा जो जीवन पर्यन्त डालटनगंज के सार्वजनिक जीवन के स्थाई तत्व बने रहे।

     आलोक वर्मा उर्फ भोलू भैया मदनकृष्ण वर्मा के 7पुत्र और 2पुत्री अर्थात् कुल 9संतानों में 7वें क्रम पर और भाईयों में 5वें क्रम पर हैं। वह बताते हैं कि मेदिनीनगर में रोटरी क्लब,ब्लड बैंक की स्थापना में उनके पिताजी मदन कृष्ण वर्मा की अहम भूमिका रही है।

       नेत्रदान और अंगदान पर शहर के जागरूक बुद्धिजीवियों के बीच एक आम सहमति बन गई थी और विहित प्रपत्र उपलब्ध कराने की जवाबदेही स्थानीय प्रसिद्ध चिकित्सक ठाकुर कन्हैया दयाल सिन्हा ने ली थी।विहित प्रपत्र उपलब्ध होने पर पिताजी का हस्ताक्षर लेने ठाकुर कन्हैया दयाल सिन्हा खुद आए थे।उस समय पिताजी पोतों को पढ़ा रहे थे।पिताजी ने नेत्रदान/अंगदान से सम्बन्धित विहित प्रपत्र पर हस्ताक्षर किए।एक पोता ने पूछा-दादाजी!दादाजी!आपने फार्म पर अकेले क्यों दस्तखत किया,हमलोगों से क्यों नहीं करवाया?पिताजी ने समझाया कि उन्होंने अपनी आँखे दान की हैं,तुमलोग भी दादा बन जाना तो नेत्रदान और अंगदान जरूर करना!

     बात सन् की है।भोलू भैया के बड़े भाई कर्नल रमण कृष्ण वर्मा दिल्ली में पदस्थापित थे।उनका बड़ा लड़का कुणाल वर्मा तब ताज होटल,दिल्ली में काम करता था।हालाँकि,उसका चुनाव भारतीय सेना में लेफ्टिनेण्ट पद पर हो चुका था और उसे अगले माह सेना में शामिल होना था।लेकिन,तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का भारत दौरा प्रस्तावित था और ताज होटल का पूरा महकमा इस दौरा के आतिथ्य में व्यस्त था।14मार्च को रात 10बजे ताज होटल के अपने सब काम निबटा कर अपनी बुलेट से कुणाल घर लौट रहा था।धौला कुआँ के निकट उसकी बुलेट दुर्घटनाग्रस्त हो गई और उसके जाँघ की हड्डी टूट गई।16मार्च को उसका ऑपरेशन निर्धारित था।ऑपरेशन की प्रक्रिया के दौरान ही उसकी मृत्यु हो गई।कर्नल रमणकृष्ण वर्मा और उनकी पत्नी नूतन वर्मा के लिए यह बहुत बड़ा सदमा था।लेकिन,उनलोगों ने खुद को सँभाला और बेटे की आँख दान कर दीं।(इतिहास का हम सिंहावलोकन करें तो सम्राट अशोक के कार्यकाल में उनके छोटे पुत्र को नेत्रदान करना पड़ा था और उनका नाम भी कुणाल था।)

    आलोक वर्मा उर्फ भोलू भैया का बड़ा लड़का अंकित वर्मा ने भारतीय जनसंचार संस्थान,दिल्ली से स्नातकोत्तर किया था।और तत्काल दिल्ली के एक प्रतिष्ठित समाचार समूह से जुड़ गया था।22अक्तूबर,2011 को भारतीय जनसंचार संस्थान,दिल्ली में एक वर्कशॉप में शामिल होने के बाद घर लौटने के क्रम में खन्ना स्टेडियम के निकट वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया।एक संवेदनशील महिला संगीता शर्मा ने उसे एम्स,दिल्ली पहुँचाया। उसके पर्स से मोबाईल से ढूँढ़ कर संगीता शर्मा ने ही भोलू भैया को आधी रात को फोन किया। भोलू भैया ने तत्काल दिल्ली के अपने तमाम रिश्तेदारों,मित्रों,शुभचिन्तकों को फोनकर सूचित किया और भाभी इभा वर्मा के साथ भाया पटना दिल्ली पहुँचे।लेकिन,वह बेटे को बचा नहीं पाए।23अक्तूबर,2011 को अंकित वर्मा ने अंतिम साँसे ली।उस दिन रविवार था और रविवार को सामान्य तौर पर पोस्टमार्टम नहीं होता।लेकिन,भोलू भैयाने अस्पताल प्रबन्धन से विशेष आग्रह किया कि रविवार को पोस्टमार्टम कर दिया जाए ताकि वह अपने बेटे के कामयाब अंगों का अंगदान कर सकें। अंगदान के माध्यम से मानवता की सेवा करने के उनके जज्बे और समर्पण को ध्यान में रखते हुए अस्पताल प्रबंधन ने भोलू भैया के विशेष अनुरोध को स्वीकार कर लिया।इस प्रकार,भोलू भैया ने जवान बेटे के नौ कामयाब अंगों का अंगदान करने के बाद शेष अंगों का ही अंतिम संस्कार किया।

  रक्तदान,नेत्रदान,अंगदान मानवीय संवेदना और करूणा की पहचान है।यह अपार हर्ष और संतोष का विषय है कि दैनिक भास्कर जैसा प्रतिष्ठित अखबार समूह रक्तदान,नेत्रदान,अंगदान के प्रति जागरूकता लाने की मुहिम में जुट गया है।निश्चय ही यह एक पुनीत कार्य है,जिसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम होगी।पलामू प्रमंडल में यह अभियान जब भी जोर पकड़ेगा,भोलू भैया एवं उनका परिवार नींव का पत्थर होने का एहसास कराएँगे।