एससी -एसटी एक्ट को लेकर भारत बंद !!



दिल्ली। ST-SC एससी-एसटी एक्ट के प्रावधानों को शिथिल करने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के विरोध में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों और उससे जुड़े संगठनों ने आज सोमवार 2 अप्रैल को भारत बंद बुलाया है। रविदास जयंती पर आयोजित होने वाले इस भारत बंद को लेकर खुफिया विभाग ने सरकार को अलर्ट किया है।

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च, 2018 को अपने एक फैसले में कहा था कि एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है। इसलिए एससी-एसटी एक्ट के तहत तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। इस फैसले के विरोध में ही भारत बंद बुलाया गया है।

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम 1989,(The Scheduled Castes and Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989) को 11 सितम्बर 1989 में भारतीय संसद द्वारा पारित किया था, जिसे 30 जनवरी 1990 से सारे भारत में लागू किया गया। इसके बाद अप्रैल 2016 में केंद्र सरकार ने इस कानून में कुछ संसोधन किए। इन संसोधनों के साथ 14 अप्रैल 2016 से इस कानून को फिर से लागू किया गया।

अगर कोई शख्स किसी भी तरह से किसी अनुसूचित जाति या जनजाति से संबंध रखने वाले किसी शख्स को प्रताड़ित करता है, तो उसके खिलाफ ये कानून कम करता है। और उस अपराध के लिए आईपीसी की धाराओं के अलावा इस कानून के तहत भी सजा भुगतनी होती है। इसके अलावा ये कानून पीड़ितों को विशेष सुरक्षा देता है। इस कानून के तहत पीड़ित को अलग-अलग अपराध के लिए 75,000 रुपये से लेकर 8 लाख 50 हजार रुपये तक की सहायता दी जाती है।

साथ ही ऐसे मामलों के लिए इस कानून के तहत विशेष अदालतें बनाई जाती हैं जो ऐसे मामलों में तुरंत फैसले लेती हैं। इस ऐक्ट के तहत महिलाओं के खिलाफ अपराधों में पीड़ितों को राहत राशि और अलग से मेडिकल जांच की भी व्यवस्था है। SC-STके खिलाफ मामलों में पीड़ितों को अपना केस लड़ने के लिए सरकार की ओर से आर्थिक मदद भी दी जाती है।

ये कानून देश के हर उस शख्स पर लागू होता है, जो अनुसूचित जाति-जनजाति (एससी-एसटी) का सदस्य नहीं है। अगर ऐसा कोई शख्स SC-STसे ताल्लुक रखने वाले किसी शख्स का उत्पीड़न करता है, तो उसके खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 के तहत कार्रवाई की जाती है।

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लोगों को अपमानित करना। उन्हें जबरन मल, मूत्र खिलाना।

SC-STके किसी सदस्य का सामाजिक बहिष्कार।

किसी SC-STके साथ कारोबार से इन्कार

किसी SC-STको काम न देने या नौकरी पर रखने से इन्कार करने

किसी SC-STको किसी तरह की सेवा देने से इन्कार करने

अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य से मारपीट करना।

उनके घर के आस-पास या परिवार में उन्हें अपमानित करना या फिर उन्हें किसी भी तरह से परेशान करना।

SC-STसमुदाय के किसी शख्स के कपड़े उतारकर उसे नंगा करना या फिर उसके चेहरे पर कालिख पोतना।

किसी भी तरह से सार्वजनिक तौर पर अपमानित करना।

जमीन पर जबरन कब्जा करना, गैरकानूनी ढंग से किसी जमीन को हथिया लेना।

किसी SC-STसमुदाय के शख्स को भीख मांगने के लिए मजबूर करना

उसे बंधुआ मजदूर बनाना

वोट देने से रोकना या किसी खास को वोट देने के लिए बाध्य करना।

किसी महिला को अपमानित करना

किसी सार्वजनिक जगह पर जाने से रोकना

अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को अपना मकान छोड़ने पर मजबूर करना

ये सब ऐसे अपराध हैं, जिनमें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत कार्रवाई होती है। लेकिन अगर ये अपराध किसी SC-STके समुदाय से ताल्लुक रखने वाले शख्स के साथ होता है, तो उसमें आईपीसी की अलग-अलग धाराओं के साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 के तहत भी कार्रवाई होती है।

आईपीसी की सजा के अलावा SC-STऐक्ट में अलग से छह महीने से लेकर उम्रकैद तक की सजा और जुर्माने की व्यवस्था है। अगर अपराध किसी सरकारी अधिकारी ने किया है, तो आईपीसी के अलावा उसे इस कानून के तहत छह महीने से लेकर एक साल की सजा होती है।

अगर कोई सरकारी अधिकारी SC-ST वर्ग से ताल्लुक नहीं रखता है और वो जानबूझकर किसी SC-STसमुदाय के शख्स को परेशान करता है, तो उसे छह महीने से लेकर एक साल तक की जेल हो सकती है। किसी सरकारी अधिकारी पर केस तभी दर्ज किया जा सकता है, जब पूरे मामले की जांच के दौरान सरकारी अधिकारी दोषी पाया गया हो।

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 के तहत विशेष अदालतों की भी व्यवस्था है। अधिनियम की धारा 14 के तहत इस कानून के तहत दर्ज केस के ट्रायल के लिए विशेष अदालत की व्यवस्था की गई है, जो हर राज्य में बनी हुई है।

अगर किसी के खिलाफ SC-ST ऐक्ट के तहत केस दर्ज होता है, तो पुलिस उस शख्स को तुरंत गिरफ्तार कर लेती है। इस केस में किसी तरह की अग्रिम