औरत एक पहेली



चुप रहना गुलामी है

और बोलना बदतमीज़ी

किताब के पन्नों में

साक्षात् देवी अवतार

और घर-ऑफिस में

भोग-विलासिता का साधन

दहलीज़ के अंदर रहूँ तो

गँवार और देहाती

वहीं ग़र दहलीज़ लाघूँ तो

बदचलन और वेश्या

समझ में नहीं आता कि

यह सभ्य-समाज ख़ुद को

हिजड़ेपन दर्शाने से क्यों 

बाज़ नहीं आता है यहाँ

जो वह बार-बार

औरतों के जीवन के साथ

निभाता है रॉल दो-तरफ़ा

और बेचारी औरत

पुरुषों के सारे विष को पीकर

हँसती है तो सिर्फ़

पुरुषों के पौरुष को

रखने के लिए ज़िंदा धरा पर...!


-विनोद सागर, 08.04.2018