चोर मचाये शोर


आज एक न्यूज़ पोर्टल पर IFWJ(के विक्रम राव गुट) से संबंधित एक खबर प्रकाशित की गयी है जिसमें IFWJ के विरुद्ध सर्कुलर जारी करने को लेकर मुख्य सचिव एवं पुलिस महानिदेशक की कार्यवाई पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुये यह पूछा गया है कि आख़िर किस आधार पर पत्र जारी किया गया है।न्यूज़ पोर्टल के संचालक स्वयं को विद्रोही कहते हैं और विद्रोही नाम से ही पोर्टल का संचालन कर रहे हैं।पोर्टल पर प्रकाशित खबर में उत्तरप्रदेश सरकार एवं भारतीय प्रेस परिषद के निर्णय पर भी विद्रोही पत्रकार ने आपत्ति जताई है और प्रश्नचिन्ह लगाया है,जब कि भारतीय प्रेस परिषद के आदेश को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।पत्रकारिता के माध्यम से विद्रोह करने का दावा करने वाले पत्रकार को इतनी जल्दबाजी थी कि वे भारतीय प्रेस परिषद के अधिकार एवं उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा IFWJ(विक्रम राव गुट) की मान्यत को लेकर जारी किये गये आदेश पर ही प्रश्नचिन्ह लगाया है।जब कि भारतीय प्रेस परिषद के आदेश को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दिया जासकता,शायद विद्रोही पत्रकार को इस बात की जानकारी नहीं। IFWJ(विक्रम राव गुट) की मान्यता को लेकर उत्तरप्रदेश सरकार ने भी पत्र जारी किया है जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि IFWJ का मामला न्यायालय में लंबित होने के कारण उत्तरप्रदेश शासन द्वारा पत्रांक संख्या 754/ दिनांक 29-3-2018 में स्पष्ट कहा गया है कि राज्य मान्यता प्राप्त समिति में उसे शामिल नहीं किया गया है।वर्ष 2015 में IFWJ के मथुरा अधिवेशन में के विक्रम राव को IFWJ से निष्कासित कर दिया गया था।जिसके विरुद्ध के विक्रम राव ने न्यायालय में मामला दर्ज किया है(मामला अब भी न्यायलय में लंबित है)।न्यायालय में मामला दर्ज रहते IFWJ के दोनों गुटों को भारतीय प्रेस परिषद में स्थान नहीं दिया गया है।झारखण्ड जर्नलिस्ट एसोसिएशन के पास इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं कि किस तरह IFWJ से सम्बद्धता के नाम पर झारखण्ड सहित देश भर के अन्य राज्यों से के विक्रम राव द्वारा अवैध वसूली की गयी है।झारखण्ड जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने भारतीय प्रेस परिषद एवं उत्तरप्रदेश सरकार के आदेश का पत्र भी उस पत्र के साथ संलग्न किया है।विद्रोही पत्रकार थोड़ी मेहनत कर लेते तो उन्हें भी वह पत्र उत्तरप्रदेश सरकार, भारतीय प्रेस परिषद से मिल सकता था।स्वयं को विद्रोही पत्रकार बताने वाले का उद्देश्य बिना तथ्यों को जाने झारखण्ड जर्नलिस्ट एसोसिएशन के पत्र को कठघरे में करना रहा है।विद्रोही पत्रकार मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक सहित भारतीय प्रेस परिषद को भी कठघरे में खड़ा कर रहे हैं जो यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है वे सस्ती लोकप्रियता के लिये बिना किसी तथ्यों के पड़ताल के इस तरह का लेख पूर्व में भी प्रकाशित करते आये हैं।स्वयं को IFWJ का न्यायालय में मामला लंबित रहते स्वयं को IFWJ का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बताने वाले मोहन कुमार एवं उनके साथ मुख्य सचिव कार्यालय में ज्ञापन सौंपने वाले दीपक कुमार के विरुद्ध भारतीय प्रेस परिषद में लिखित शिकायत दर्ज करायी गयी है।विद्रोही पत्रकार तथ्यों के बिना किसी एक ज्ञापन के आधार पर उत्तरप्रदेश सरकार एवं भारतीय प्रेस परिषद के आदेश को चुनौती देकर वही गलती कर रहे हैं जो के विक्रम राव पिछले चार वर्षों से करते आये हैं।के विक्रम राव के फर्जीवाड़े का एक नहीं अनेकों प्रमाण दस्तावेज के रूप में मौजूद है। 

भारतीय प्रेस परिषद (Press Council of India ; PCI) एक संविघिक स्वायत्तशासी संगठन है जो प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करने व उसे बनाए रखने, जन अभिरूचि का उच्च मानक सुनिश्चित करने और नागरिकों के अधिकारों व दायित्वों के प्रति उचित भावना उत्पन्न करने का दायित्व निर्वाहता है। सर्वप्रथम इसकी स्थापना ४ जुलाई सन् १९६६ को हुई थी।अध्यक्ष परिषद का प्रमुख होता है जिसे राज्यसभा के सभापति, लोकसभा अघ्यक्ष और प्रेस परिषद के सदस्यों में चुना गया एक व्यक्ति मिलकर नामजद करते हैं। परिषद के अघिकांश सदस्य पत्रकार बिरादरी से होते हैं लेकिन इनमें से तीन सदस्य विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, बार कांउसिल ऑफ इंडिया और साहित्य अकादमी से जुड़े होते हैं तथा पांच सदस्य राज्यसभा व लोकसभा से नामजद किए जाते हैं - राज्य सभा से दो और लोकसभा से तीन।प्रेस परिषद, प्रेस से प्राप्त या प्रेस के विरूद्ध प्राप्त शिकायतों पर विचार करती है। परिषद को सरकार सहित किसी समाचारपत्र, समाचार एजेंसी, सम्पादक या पत्रकार को चेतावनी दे सकती है या भर्त्सना कर सकती है या निंदा कर सकती है या किसी सम्पादक या पत्रकार के आचरण को गलत ठहरा सकती है। *परिषद के निर्णय को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती*