वैदिक शास्त्रों सहित देवी देवताओं की अवहेलना हो उसमें पंडित कहलाने वाले साधु को सम्मिलित नहीं होना चाहिए-शुकामृत

वैदिक शास्त्रों सहित देवी देवताओं की अवहेलना हो उसमें पंडित कहलाने वाले साधु  को सम्मिलित नहीं होना चाहिए-शुकामृत 

खूँटी(03 फर.): हरे कृष्ण प्रचार केंद्र, खूंटी के माध्यम से एक दिवसीय भगवद्गीता कार्यक्रम का आयोजन  इस्कॉन भक्त शुकामृत दास ने  शुभारंभ किया ! प्रवचन करते हुए  दास जी ने कहा वर्तमान सामाजिक परिवेश में जिस पद्धति से सरस्वती मां की पूजा की जा रही है वह पूर्णतः गलत है । कोई भी शिक्षा वह भौतिक ही क्यों ना हो उसमें अगर अध्यात्मिकता नहीं है तो वह शिक्षा विद्या नहीं अविद्या है,और सरस्वती माता पूर्णतः आध्यात्मिक है और लोग जड़ विद्या ग्रहण करने हेतु माता रानी की पूजा करते हैं जिससे उन्हें माया रूपी भ्रम प्राप्त तो होता है परंतु जीव कल्याण हेतु परम ज्ञान नहीं! पुराणों में भगवान कृष्ण के  उपदेशों के अनुसार सरस्वती माता का बसंत पंचमी में यह प्राकट्य का प्रयोजन नहीं है।क्योंकि भौतिक शिक्षा घटाव आध्यात्मिक शिक्षा बराबर दुखदाई परिणाम परंतु भौतिक शिक्षा जोड़ आध्यात्मिक शिक्षा आनंद प्रदायिनी परिणाम। एक बार की बात है शास्त्रों से विदित होता है एक बार द्रोणाचार्य ने अपने शिष्य युधिष्ठिर और दुर्योधन को आज्ञा दी! जाओ इस लोक में युधिष्ठिर तुम अपने से किसी निम्न व्यक्ति को खोज करके लाओ एवं दुर्योधन तुम अपने से किसी श्रेष्ठ व्यक्ति को खोज कर लाओ शाम ढली दोनों गुरु के पास पहुंचे । द्रोणाचार्य ने कहा, कहो दुर्योधन तुम्हें इस लोक में तुमसे श्रेष्ठ व्यक्ति कोई मिला दुर्योधन ने उत्तर दिया नहीं गुरु जी मैंने सभी जगहों को छान मारा मुझसे श्रेष्ठ कोई नहीं दिखता मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूं! आगे द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर से कहा बताओ तुम्हें कोई मिला धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा मैं जहां भी गया सभी लोग मेरे से श्रेष्ठ ही नजर आए इसलिए मैं ही उनमें से सबसे निम्न हूं। इससे पता चलता है जो आध्यात्मिक ज्ञान में को जितना ज्यादा हृदयआंगन करता है वह उतना ही झुकता है। धर्मराज युधिष्ठिर महाराज का यह आध्यात्मिक ज्ञान का प्रभाव था।भौतिक शिक्षा से अहंकार आता है जिसके उन्माद में व्यक्ति धर्म और अधर्म के मार्ग से भटक जाता है,जैसे दुर्योधन। आज के समाज में यह देखने को मिल रहा है भौतिक ज्ञान में मदमस्त  लोग ज्ञान, संगीत, मेघा की देवी सरस्वती के रूप में परम चेतना हमारी बुद्धि, प्रज्ञा और सभी मनोवृत्तियों का संरक्षण करने वाली माता का वैभव परम है परंतु धार्मिक दृष्टिकोण से समाज में फैल रहे ऐसे पूजा पद्धति जिसमें मुख्यत वैदिक शास्त्रों सहित देवी देवताओं की अवहेलना की जाती हो उसमें पंडित कहलाने वाले किसी साधु पुरुष को सम्मिलित नहीं होना चाहिए। क्योंकि कठोपनिषद शास्त्र में वर्णित है अज्ञानी लोग दूसरे अंधे लोगों के पास नेतृत्व प्राप्त करने के लिए जाते हैं, फलस्वरूप दोनों को कष्ट उठाना पड़ता है। एक अंधा दूसरे अंधे को गड्ढे में ले जाता है! इसका उदाहरण पुराणों में बताया गया पूजा पद्धति से  भिन्न है जिसमें मूर्ति स्थापित प्रक्रिया एवं  चौबीसों घंटे फिल्मी गीतों से मां सरस्वती का स्तुति एवं मूर्ति भाषानो में मदिरापान का सेवन वैदिक साहित्य के विरुद्ध  है । धर्म धर्म के मार्ग से ना हटे! जिसके लिए सभी विद्वान जनों को बैठकर चिंतन करने की आवश्यकता है।

     मौके पर आए भक्तों के बीच भागवत गीता एवं  भगवान नाम की माला भक्तों को प्रदान की गई। खूंटी नगर एवं हुरलूंग, हुटार गांव के भक्तों के बीच चावल, दाल, सब्जी, साग, सलाद महाप्रसाद का वितरण किया गया ।