इंसान की रूह को ताकत देता है रोज़ा (मौलना सैयद मूसवी रजा)

रमज़ान उल मुबारक की अहमियत और फजीलत बेशुमार है अल्लाह के नजर में हर दिन हर माह बराबर है लेकिन वही अल्लाह रमज़ान को बहुत प्रिय रखता है इसी माह क़ुरान के नाजिल होने का ज़िक्र किया जाता रहा है पूरा महीना मोमिन इबादत के नाम कर देता है अल्लाह ने क़ुरान में फरमाया अये ईमान वालों तुम्हारे लिए रोज़े को ऐसे वाजिब करार दिया है जैसे तुमसे पहले वालों पर किया गया था ताकि ताक्वा अपना सको रोज़ा शब्द का अर्थ किसी भी चीज से अपने आपको रोकना फतवा के ज़बान में रोजेदार का अल्लाह के हुक्म से सुबह की अजान से मगरिब कि अजान तक बातिल ( गलत,फ़िज़ूल,झूठ,बुराई) करने वाली चीज़ों से दूरी बनाए रखना है उपवास करने का प्रचलन लगभग सभी धर्म समाज में है धार्मिक ग्रंथों में भी इसका ज़िक्र आया है जैसा कि बाइबिल में है कि हज़रत मसीह ने 40 दिन रोज़े रखे थे क़ुरान साफ साफ बयान करता है कि रोज़ा पिछली पिछली उम्मतों पर भी वाजिब था रोज़ा रखने के कई फायदे हैं क़ुरान में ही अल्लाह फरमाता है कि  रोज़ा इंसानी रूह को मजबूत करता है उसे ताकत देता है रोज़ा फाक़िर और अमीर के फर्क को मिटाता है ताकि लोग भोख और प्यास को महसूस करके फकीरों और गरीबों का खयाल रखें इस बारे में बहुत सी हदिसें हैं रोज़े द्वारा सवास्थ्य और चिकित्सा के मामले में भी सुधार लाता है और ये हमारी सेहत और फिटनेस का भी कारण है पैगम्बर ए इस्लाम (मुहम्मद साहब) का भी फरमान है कि रोज़ा रखो ताकि फिट यानी सेहत्याब रह सके रोज़ा एक इबादत है और अल्लाह के इस हुक्म पर अमल करने के लिए हर उस चीज से दूर रहने की जरूरत है जो रोज़े को बातिल कर देती है और यही रोज़े की नीयत भी है 

(लेखक कायदे मिल्लत मौलाना सैयद मूसवी रजा हुसैनाबाद झारखण्ड)