पानी रे पानी तेरा रंग कैसा............... (भाग - एक ) डॉ अरूण कुमार सिंह--------


आज के तीस साल पहले, यदि आप अपने परिवार से लाख या पचास हजार रूपये यह कहकर मांगते कि इस रूपये से आप पानी का धंधा करेंगे, यानी पानी बेचेंगे, तो निश्चित रूप आपके परिवार के लोग चौंकते और आपको कहते कि "तेरा दिमाग ठिकाने तो है ? क्या हवा और पानी खरीदने और बेचने की चीज है ? इतनी अनैतिक बात तुम सोच भी कैसे सकते हो ?"


आपकी पीढ़ी ने यह देखा हो कि न देखा हो, लेकिन मेरी पीढ़ी ने यह देखा है कि एक अनजान व्यक्ति भी जब दरवाजे पर आ जाते थे तो उनका प्रारंभिक स्वागत एक लोटा पानी और गुड़ से जरूर होता था ...


लेकिन आज का वीभत्स सच यही है कि पानी बिक रहा है । हर जगह पर बिक रहा है । बोतलबंद पानी पीने वाले लोग स्टेट्स सिंबल हैं । यह पानी ही अब जीवन दायिनी माना जा रहा है ...


हम पानी की बावत आपसे ढेर सारी बातें करने वाले हैं । उसके पहले आपसे एक सवाल पूछना चाहते हैं कि जो परिवार, जो समाज और जो सरकार किसी को मुफ्त पानी भी न पिला सके, तो उसे किस नजर से देखा जाना चाहिए ? और, यह भी कि वैसे सरकार को सत्ता में रहने का हक क्यों है ? अथवा वैसे सरकार को हम क्यों चुनें ?


मेरे मित्र श्री राम डाल्टन ( जो 61 वें राष्ट्रीय फिल्म विजेता हैं और जिन्होंने स्प्रिंग थंडर नामक फुल लेंथ हिंदी फिल्म बनायी है, ने अभी कुछ दिन पहले दो हजार किलोमीटर की पैदल यात्रा पर हैं । अन्य मुद्दों के अलावा इस यात्रा का प्रमुख मुद्दा यह भी है कि पानी बिकना बंद हो और सभी को पीने का साफ पानी मुफ्त मिले ।


श्री राम की यह बात हर किसी के दिल तक उतर जानेवाली है । सिवाय उसके, जो पानी की तिजारत न कर रहा हो ....


वे हमें डरा डरा कर पानी बेच रहे हैं और हम मरने के डर से और ज्यादा जीने की लालसा में पानी खरीद कर पी रहे हैं । इसी वर्ष रूस के एक सर्वेक्षण में कहा गया है कि पानी खरीदने के लिए मानसिकता बदलने का यह खेल अगले पांच वर्षों के भीतर, गरीब और विकासशील देशों में भी ऐसा होने वाला है कि अभाव में एक वक्त भूखा रहने वाला व्यक्ति भी खरीदकर पानी पीना चाहेगा । तो, इस दिन के आने के पहले ही सावधान हो जाइये । इसलिए कि आपको अगर बोतलबंद पानी का चस्का लगा तो आप प्रतिदिन अपने परिवार के सात से दस अहम् जरूरतों को आग लगाने वाले हैं...


अब, थोड़ा बोतलबंद पानी की कहानी हो जाए । 1845 में पहली पानी कंपनी पोलैण्ड के मैनी में शुरू हुई जिसका नाम था पोलैण्ड स्प्रिंग बाटल्ड वाटर कंपनी। 1845 से शुरू हुआ बोतलबंद पानी का यह कारोबार आज 100 अरब डालर का भरापुरा उद्योग है। दुनिया में हर साल 100 अरब डालर से भी ज्यादा पैसा बोतलबंद पानी खरीदने पर खर्च किया जाता है । भारत भी इससे अछूता नहीं है। हालांकि यहां पानी के बोतलबंद व्यापार की शुरूआत बहुत देर से हुई यानी अस्सी के दशक में। उस समय फ्रांस की एक कंपनी डैनोन मिनरल वाटर का व्यापार करने आई थी। उसने एक लीटर पानी की कीमत रखी 70 रुपए। आज भारत में बोतलबंद पानी का व्यापार करनेवाली लगभग 100 कंपनियां और उनके 1200 बाटलिंग प्लांट हैं। इनमें वे कंपनियां और ब्राण्ड शामिल नहीं हैं जो कुटीर उद्योग की तर्ज पर पाउच पैक पानी का व्यापार कर रही हैं।


गौर करियेगा, मिनरल वाटर के नाम पर बिकने वाला बोतलबंद पानी अपने बनने के दौरान दुगुना पानी खर्च कर देता है। मसलन एक लीटर मिनरल वाटर बनाने पर दो लीटर साफ पानी खर्च करना पड़ता है। यानी जब आप एक लीटर पानी पीते हैं तो आप एक नहीं बल्कि तीन लीटर पानी खर्च करते हैं। इस लिहाज से आप प्रतिदिन अगर स्वस्थ रहने के लिए तीन लीटर पानी पीते हैं और वह मिनरल होता है तो आप तीन नहीं बल्कि नौ लीटर पानी पीते हैं। इस गणना को ज्यादा तार्किक तौर पर समझना हो तो अमेरिकी नागरिकों को देखिए। जो प्रतिदिन 100 से 176 गैलन पानी खर्च करते हैं। जबकि औसतन प्रति व्यक्ति पानी की जरूरत किसी भी तरह से चार-पांच गैलन से ज्यादा नहीं होती। अफ्रीका के अधिकांश देशों में प्रति व्यक्ति पानी की कुल उपलब्ध्ता ही पांच गैलन है। यानी औसत अमरीकी पानी का 20 से 30 गुणा ज्यादा दुरूपयोग करता है। इसकी कीमत अमरीकन कितना चुकाते हैं यह तो नहीं मालूम लेकिन दुनिया के दूसरे देश और भूमंडल का पर्यावरण इसकी कीमत जरूर चुकाता है। जितना बोतलबंद पानी अमरीकी पीकर पेशाब कर देता है उसको बनाने के लिए अमरीका में हर साल 72 बिलियन गैलन पानी बर्बाद किया जाता है। वहां हर पांचवा आदमी बोतलबंद पानी ही पीता है। इसके लिए पिछले साल 2007 में अमरीका में 31 अरब लीटर मिनरल वाटर बेचा गया।


बोतलबंद पानी में पानी तो आदमी पी जाता है लेकिन बोतल पर्यावरण के सिर आ पड़ती है। पैसिफिक इंस्टीटयूट का कहना है कि अमरीकी जितना मिनरल वाटर पीता है उसका बाटल बनाने के लिए 20 मिलियन बैरल पेट्रो उत्पादों को खर्च किया जाता है। एक टन बाटल तीन टन कार्बन डाईआक्साईड का उत्सर्जन करता है। इस तरह 2006 में खोजबीन के जो आंकड़े सामने आए हैं उससे पता चलता है कि अमरीकियों ने पानी पीकर 250 मिलियन टन कार्बन उत्सर्जन कर दिया।

तो, बोतल में बंद होता पानी और बोतल के खतरे और भी हैं। यह भारी मात्र में पेट्रो उत्पादों की खपत करता है और पर्यावरण का नाश तो करता ही है। मसलन कई बार ट्रकों से ही नहीं रेल और पानी के जहाज से भी पानी को ट्रांसपोर्ट किया जाता है। इस तरह एक बोतल बनाने और उसमें पानी भरकर उपभोक्ता तक पहुंचाने में वह ढेर सारी उर्जा खर्च करता है। ऊपर से उन बाटल्स के रिसाइक्लिंग का भी कोई सुनिश्चित तरीका नहीं होता। दुनिया भर में पानी को बेचने के लिए जितना प्लास्टिक उपयोग किया जाता है उसका नब्बे फीसदी बिना रिसाइक्लिंग के जमीन पर फेंक दिया जाता है। अमरीका में ही 80 प्रतिशत पानी की बोतलों को बिना रिसाइक्लिंग के खुले मैदानों में फेंक दिया जाता है ....

क्रमश: