आपको उन्हीं का पानी गवारा क्यूं है, जिनका "पानी" मर चुका है....? ("पानी रे पानी तेरा रंग कैसा" का दूसरा भाग) --डॉ अरूण कुमार सिंह



सामने चापानल का मीठा और साफ पानी हो, तब भी आप बोतलबंद पानी पर ही भरोसा करते हैं । आपको यह भी मालूम नहीं कि आप जिस कंपनी का बोतलबंद पानी पी रहे हैं, उसका टेस्ट परिणाम क्या है ? पानी खरीदते वक्त शायद ही आपका ध्यान बोतलबंद पानी के मैनुफैक्चरिंग और एक्सपायरी डेट पर जाता हो ! आप यह सोचने की जहमत भी नहीं उठाते कि प्लास्टिक के बोतल में, दिनभर तेज धूप में रखा गया बोतलबंद पानी फ्रीज में जाते ही एकाएक अमृत तुल्य कैसे हो जाता है ? 

बेसुमार विज्ञापन और चंडूखाना के गल्प ने आपके दिमाग में बोतलबंद पानी बिठा दिया गया है । आप संबद्ध कंपनी के पानी का स्रोत, उसके गुण आदि की बावत सोच ही नहीं सकते....

क्या आपको पता है कि प्लास्टिक अपने आप में एक तरह का जहर है और उसमें रखी गयी हर तरल पदार्थ में कुछ दिनों बाद उसका दोष आना तय है ?

क्या आप जानते हैं कि लैब टेस्ट में 90 फीसदी से ज्यादा बोतलबंद पानी में माइक्रोप्लास्टिक पाये गए हैं ? और, प्लास्टिक के कण में पॉलीप्रोपलीन, नायलॉन, पॉलीथिलीन टेरेफ्थेलेट जैसे तत्व मौजूद रहते हैं और व्यक्ति एक लीटर बोतलबंद पानी से प्लास्टिक के दस हजार सूक्ष्म कण तक ग्रहण कर लेता है ?

क्या आप जानते हैं कि केवल भारत में लगभग आठ हजार करोड़ रूपये के उद्योग के रूप में फल फूल रहा बोतलबंद पानी बेचने वाले लोग इसे अमृत बताने वाले विज्ञापनों पर कितना खर्च करते हैं ?

आपको यह जानना चाहिए कि नौ देशों में 11 ब्रांड के ढाई सौ से अधिक बोतलबंद पानी टेस्ट में नहीं पीने लायक और हानिकारक पाये गये । इनमें बिसलेरी, एक्वाफिना जैसे ब्रांड भी शामिल थे । फिर लोकल ब्रांडों की क्या स्थिति होगी, आप सोच सकते हैं । 

फिर, हम पहले लेख में ही बता चुके हैं कि एक बोतलबंद पानी तैयार करने में कितना पानी बेकार होता है और पानी के खाली बोतल धरती पर कितने हानिकारक हैं !

तो फिर, आप ही बतायें कि आपको उन्हीं का पानी पीना क्यों गंवारा है, जिनका "पानी" ही मर चुका है ? फिर चाहे यह देश, समाज के बनिस्पत हो या आखों के, क्या फर्क पड़ता है ?

क्रमश: