बाबूजी, कहाँ चलिएगा?" सड़क किनारे चलते दो व्यक्तियों को देखकर अपने रिक्शे को उसी दिशा में मुड़ाते हुए श्यामा ने पूछा था।

रिक्शेवाली     (लघुकथा)


"बाबूजी, कहाँ चलिएगा?" सड़क किनारे चलते दो व्यक्तियों को देखकर अपने रिक्शे को उसी दिशा में मुड़ाते हुए श्यामा ने पूछा था।


"पुलिस लाइन। कितना लोगी?"


"40 रुपये बाबूजी।"


"बहुत ज़्यादा है। मैं 30 रुपये ही दूँगा। चलना है तो चलो।"


"ठीक है, बैठिए।" बिठाने के बाद रिक्शे खींचते हुए श्यामा के दिमाग़ में एक्सीडेंट में मरे हुए पिताजी का चेहरा घूम रहा था, वहीं अस्पताल में एडमिट माँ की कराहें भी उसे कचोट रही थीं। साथ ही दो छोटी बहनों के भूख-प्यासे से व्याकुल चेहरे भी सीने में नश्तर की मानिंद चुभ रहे थे। सुबह से कुल आमदनी 65 रुपये की हो चुकी थी। वह मन-ही-मन यह सोचकर ख़ुश की 60 रुपये की माँ की दवा लेकर बाक़ी बचे रुपयों से बहनों के साथ वह भी आज खाना खाएगी। 


"यही पर रोक दो।" आवाज़ सुनकर वह अचानक से ब्रेक लगाई। रिक्शे सवार ने उसे 100 के नोट थमाया।


"बाबूजी, मेरे पास छूटे सिर्फ़ 65 रुपये ही हैं...!"


"कोई बात नहीं, वही दे दो। कभी फिर पाँच रुपये मिलने पर लौटा देना।" सुनकर भावना से श्यामा की आँखें भर आई थी। उसे लगा कि वह साक्षात ईश्वर की दर्शन कर रही हो। वह रिक्शे को मेडिकल स्टोर की तरफ़ मोड़ चुकी थी। उसने दुकानदार को दवा की पर्ची थमाई और दवा लेने के बाद 100 का नोट भी।


"यह नोट नकली है।" दुकानदार की आवाज़ सुन जैसे श्यामा के पाँव तले ज़मीन खिसक गई हो। वह चकर खाकर गिरते-गिरते बची। कुछ देर खड़ी किस्मत को कोसती रही, फिर नई सवारी की खोज में पुनः सड़कों पर आ गई।


-विनोद सागर, जपला