पंकज श्रीवास्तव की कलम से उन्ही की आप बीती

पंकज श्रीवास्तव की कलम से उन्ही की आप बीती 


 आज 2 सितम्बर है।मैं अब दिन गिन रहा हूँ-वनाँचल ग्रामीण बैंक में अपने प्रोफेशनल कैरियर से सेवानिवृति के लिए।अब यह अवधि वर्ष और माह में नही,महज दिन में बच गए हैं।रामचरितमानस की शायद चौपाई है-गयो माघ,दिन उनतीस बाकी।तो मेरी सेवानिवृति में महज उनतीस दिन शेष रह गए…।

…..लेकिन,मैं बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा हूँ-अपनी जिन्दगी की नई पाली की-जब मैं सार्वजनिक जीवन के लिए,साहित्य-संस्कृति के लिए,पत्रकारिता के लिए,यात्रा,भ्रमण,देशाटन,पर्यटन,यायावरी और घुमक्कड़ी के लिए ज्यादा उपलब्ध रहूँगा।

…….लेकिन,क्या यह प्रासंगिक और समीचीन नहीं होगा पीछे मुड़कर जिन्दगी की पिछली पाली के स्मरण की,जिसे यशपाल ने सिंहावलोकन कहा और कई साहित्यकारों ने कई और शब्द दिए हैं।

………अखबार,पत्र-पत्रिका मैंने संभवत: 1969में शुरू कर दिया था। 21जूलाई,1969 को अपोलो-11 यान जब नील आर्मस्ट्राँग और उनके दो मित्रों को लेकर चाँद की सतह पर उतरा था तो बीबीसी, लन्दन से हिन्दी कमेण्ट्री 1.30बजे रात तक सुनना याद है।…और उसी साल मेरे गॉडफादर डॉ ए के सेन पटना पश्चिमी विधान सभा क्षेत्र से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट बिहार विधान सभा क्षेत्र के लिए निर्वाचित हुए थे।

         1970लगभग पूरे वर्ष मैं बिमार रहा था।22अक्तूबर,1970 को डॉ एके दत्ता ने मुझे ट्यूबरक्यूलर मेनिंन्जाईटिस का मरीज घोषित किया था,जिसका लम्बा इलाज चला था,लगभग ढाई तीन वर्ष।इसी क्रम में मैं मार्च,1971 से सितम्बर,1971तक(बीच में एक छोटी अवधि जूलाई,71-अप्पू के जन्म के समय मैं पटना में रहा।) मैं राँची मँझला मामा-मामी के साथ रहा।….और जब आज बच्चों को चाचा,मामा,मौसा,फूफा के साथ रहना दूभर देखता हूँ तो मैं बड़े फक्र के साथ कह सकता हूँ कि मैं मामा के चार बच्चों के साथ ही पाँचवाँ बच्चा था,उन सभी चारों से बड़ा।मामा-मामी के बड़प्पन को जो मैंने देखा है,उसके लिए फिर कभी अलग से लिखूँगा।मुझे मुकेश के गाने तावा पर सुनने हैं,अपना यह शौक मैं सिर्फ और सिर्फ मामी से कह सकता था और जानता था-मेरा यह शौक पूरा होगा।अखबार में मैंने फिलिप्स-स्कीपर का विज्ञापन देखा और मुजफ्फरपुर की अगली ट्रिप में मैंने मामा से खरीदवा लिया।….मँझला मामा-मामी के प्रति मेरे मनोभावों पर कई बार छोटकी मामी ने टिप्पणी की है।

1971 में राँची से कोई स्तरीय दैनिक नहीं निकलता था।संभवत:,12पैसे में पटना से प्रकाशित 'आर्यावर्त' आता था,वह भी 3बजे दिन में।

मामा प्राय: मजिस्ट्रियल ड्यूटी में ही होते थे।वेतन मिलने के बाद मामी हम सब बच्चों को रिक्शा में लेकर मेन रोड जाती।मद्रास कॉफी हाउस में हमलोग मसाल दोसा खाते।रिक्शा पर सीट पर मामी,बेबी,गुड़िया होती,मंटूू5-6 साल का था,वह मामी की गोदी में होता,हम और प्रकाश हुड में बैठ लेते।तब तक मैंने किसी उस स्तर के होटल में नहीं खाया था,सो पहली बार काँटा-चम्मच से साबका वहीं पड़ा था। मंटू हँसने लगा-पप्पू भैया को काँटा-चम्मच से खाना नहीं आता। लेकिन मामी ने काँटा-चम्मच पकड़ना और उससे खाना सीखाया।

       1971में ही तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान(वर्तमान बाँग्लादेश) में गृहयुद्ध की स्थिति थी।बाद में इंदिराजी की कूटनीति के तहत भारतीय फौज ने बाँग्लादेशी नागरिकों की तरफ से पाकिस्तानी फौज के खिलाफ मोर्चा सँभाला था।इन खबरों को मैं बहुत गंभीरता से पढ़ता था।इसकी चरम परिणति दिसम्बर,1971में भारत पाक युद्ध के रूप में हुई थी।3दिसम्बर,1971 को मैं पटना हवाई अड्डा के बगल में सरकारी डेयरी फार्म से घी खरीदने गया था।सो हवाई अड्डा घूमने चला गया।उसी समय,एक हवाई जहाज रूका और उससे उतरे तत्कालीन रक्षा मंत्री बाबू जगजीवन राम।हवाई अड्डा के लाउँज में आकर उन्होंने कुछ लोगों से कहा-मैं यह बात छुपाना नहीं चाहता कि पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी फौज के खिलाफ जो लोग लोहा ले रहे हैं,उनमें बड़ी संख्या सादी वर्दी में भारतीय फौजी हैं।उसी शाम भारत-पाक युद्ध छिड़ा।अगले दिन,अखबारों में पढ़ा-बाबू जगजीवन राम हवाई अड्डा पर प्रेस काँफ्रेस को संबोधित कर रहे थे।इस तरह,अपनी जिन्दगी का पहला प्रेस काँफ्रेस मैंने 3दिसम्बर,1971 को देखा,जिसे जगजीवन बाबू ने सम्बोधित किया था।

मेनिंजाइटिस की वजह से 1971में मैंने मैट्रिक का सेण्ट-अप नहीं दिया और 1972में एक बार फिर मिलर स्कूल में मैट्रिक गया।लेकिन इस बार बिनय (बिनय मोहन नागपटनी) नहीं था,वह मैट्रिक की परीक्षा दे रहा था।'वाणी मन्दिर' में स्कूल की शुरूआत से लेकर मैट्रिक तक मैं और विनय साथ रहे थे,सिर्फ 8वीं क्लास को छोड़कर,सो दुबारा मैट्रिक पढ़ना कुछ दिन तक कष्टकर था।इस तरह मैंने मैट्रिक 1973में पास किया।(क्रमश:)